Ott Platforms Give New Identity To Hindi Dialects Making Them The Language Of Heroes
बोलियों में छिपी हिंदी की असली ताक़त
नवभारतटाइम्स.कॉम•
देश की आजादी महज सीमाओं का नहीं - कलाकारों, अदाकारों, फनकारों और भाषाओं का भी बंटवारा थी। लिहाजा आजादी के बाद हिंदी फिल्में खुद अपनी भाषा की तलाश में थीं। यह वह संक्रमणकाल था, जब हिंदी सिनेमा की भाषा साहित्यिक हिंदी, उर्दू और बोलचाल के बीच अपना रास्ता बना रही थी। ऐसे में अवध, पूर्वांचल, बुंदेलखंड या पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थानीय बोलियों के लिए बहुत ज्यादा जगह नहीं बन पाई। फिल्म की भाषा एक ऐसी ‘हिंदुस्तानी’ होती गई, जिसे पूरे देश में समझा जा सके। यह व्यावहारिक भी था, लेकिन इसके साथ एक कीमत भी चुकानी पड़ी - स्थानीय आवाजें पर्दे से दूर होती गईं।
सीमित इस्तेमाल । 50 और 60 का दशक आते-आते स्थानीय भाषा कभी-कभार फिल्मों में सुनाई जरूर देने लगी, लेकिन वह भी अक्सर अवधी या पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोलचाल का एक हल्का-सा रूप भर होती। इसकी एक वजह यह भी थी कि फिल्म लेखकों का हिंदी संवादों की जानकारी रखने वाला बड़ा हिस्सा अवध या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों से आता था। उनकी अपनी बोलचाल के शब्द और लहजे संवादों में आ जाते। स्थानीय भाषा का इस्तेमाल प्रायः नौकर, माली या किसी छोटे किरदार के एक-दो संवादों तक सीमित रहता था।भाषा की विडंबना । 70 का दशक आते-आते स्थिति थोड़ी बदली, लेकिन जिस तरह बदली, उसमें एक विडंबना थी। स्थानीय बोली अब दिखाई देने लगी, मगर अक्सर हास्य पैदा करने के लिए। पानवाला, मजदूर, मसखरा, गमछाधारी खलनायक या गांव से शहर आया कोई भोला पात्र - इनके हिस्से में स्थानीय भाषा आती थी। यानी भाषा से चरित्र की सामाजिक हैसियत भी तय होने लगी। ‘अवतार’ में यूनुस परवेज का किरदार याद आता है, जो अपनी खास पूरबी बोली में शायरी करता है, लेकिन उनका रामदुलारे चौरसिया मूलतः पानवाले के किरदार तक ही सीमित रहता है। वह अपनी बोली के कारण याद तो रह जाता है, लेकिन नायक नहीं बनता। यही उस दौर की एक बड़ी समस्या थी।
सीमा में बंधकर । फिल्म लेखकों ने बड़ी ताकतों के आगे भाषा की स्थानीयता को काबिल ए तरजीह ही नहीं जाना। ऐसा भी नहीं कि किसी ने प्रयास नहीं किया। किया, मगर वह भी सीमा में रहकर ही कर पाया। अलीगढ़ से आए शिव कुमार शर्मा जैसे फिल्मकार जब स्थानीय परिवेश और भाषा वाले नायक को सामने लाना चाहते थे, तो ‘लल्लू राम’ जैसी फिल्म ही बना पाते हैं। इसी प्रयास में आलोचक एक उदाहरण ‘गंगा जमना’ का दे सकते हैं, जहां नायक स्थानीय बोली बोलता हुआ दिखता है और वह दिलीप कुमार भी है। यहां यह जानना भी उतना ही मुफीद है कि इन्हीं कारणों से कोई जब पैसा लगाने को राजी न हुआ तो दिलीप कुमार को खुद यह फिल्म निर्मित करनी पड़ी।
सबसे बड़ा बदलाव । ‘नदिया के पार’ जैसी फिल्म का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। गांव और उसकी अपनी भाषा में बनी यह फिल्म जब बड़ी हिट हुई तो निर्माता के सामने सवाल था, क्या इसी भाषा व परिवेश को और बड़े दर्शक वर्ग तक ले जाया जा सकता है? जवाब में हिंदी फिल्म बनी, ‘हम आपके हैं कौन’। यानी सफलता की भाषा को फिर मुख्यधारा की मानक हिंदी में अनुवादित करना जरूरी समझा गया। स्थानीय भाषा सफलता दिला सकती थी, पर ‘बहुत बड़ी’ सफलता के लिए हिंदी को फिर शहर और मानक भाषा की ओर लौटना पड़ता था। ओटीटी ने इसी मिथक पर बड़ा प्रहार किया है।
वैश्विक प्रभाव । ‘मिर्जापुर’ का कालीन भैया आज किसी ‘स्थानीय’ किरदार की तरह नहीं देखा जाता। उसकी भाषा पूर्वांचल से आती जरूर है, लेकिन उसका प्रभाव वैश्विक है। उसने साबित किया कि स्थानीय लहजे में बोलने वाला किरदार भी कहानी का सबसे शक्तिशाली चेहरा हो सकता है। ‘पंचायत’ देखते हुए दर्शक को कभी ऐसा नहीं लगता कि किसी दूसरे प्रदेश की भाषा जबरन उसके सामने रखी गई है। बल्कि उस भाषा के जरिए उसे गांव, उसके रिश्ते, राजनीति, हास्य और वहां की जीवन-शैली का अनुभव मिलता है।
बड़ी उपलब्धि । ‘कोहरा’ में पंजाबी सिर्फ संवाद बोलने का माध्यम नहीं है। उसके जरिए गैर-पंजाबी दर्शक भी पंजाब की सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया के करीब जाता है। सबटाइटल इस दूरी को और कम कर देते हैं। दर्शक शब्द का अर्थ स्क्रीन पर पढ़ लेता है, लेकिन कान उस शब्द के लहजे को पहचानना शुरू कर देते हैं। यही वह अनुभव है जो पारंपरिक सिनेमा में मुश्किल था। OTT की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उसने प्रांतीय भाषा को मजाकिया संवादों और मसखरे किरदारों की कैद से निकालकर नायक की भाषा बना दिया।
नई पहचान । इस बदलाव से देश के अलग-अलग हिस्सों के दर्शकों को अब समझ में आ रहा है कि हिंदी एकरंगी भाषा नहीं है। उसकी ताकत उसकी बोलियों में है। बनारस की हिंदी, बलिया की हिंदी, मिर्जापुर की हिंदी, बिहार की हिंदी या पंजाब में बोली जाने वाली हिंदी - इनमें से हर एक अपने साथ एक भूगोल और एक संस्कृति लेकर आती है। कभी जिस बोली को नायक बनने की राह में बाधा समझा जाता था, वही आज नायक की पहचान बन रही है। बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस अब स्थानीय कहानियों और भाषाई संसारों को तलाश रहे हैं। यह सिर्फ ओटीटी की सफलता नहीं, हिंदी की भी सफलता है।
सुखद संकेत । किसी भाषा का विस्तार तब नहीं होता, जब वह अपनी बोलियों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ती है। उसका असली विस्तार तब होता है, जब वह अपनी सारी बोलियों को साथ लेकर चलती है। ओटीटी ने हिंदी के साथ शायद यही किया है। उसने हिंदी को एक भाषा की तरह नहीं, कई आवाजों वाले एक बड़े सांस्कृतिक संसार की तरह सुनाना शुरू किया है। यह एक सुखद संकेत है। (चर्चित लेखक)