When Language Becomes A Weapon Threat To Indias Unity And Diversity
भाषा जब हथियार बने, चिंता करनी चाहिए
नवभारतटाइम्स.कॉम•
देश में हर कुछ महीनों पर भाषा को लेकर वही पुराना विवाद उठ खड़ा होता है। कहीं त्रिभाषा फॉर्म्युला मुद्दा बनता है, तो कहीं किसी अभिनेता की हिंदी पर टिप्पणी राष्ट्रीय बहस में बदल जाती है। भाषा संवाद का माध्यम होने के बजाय यह तय करने का पैमाना बन जाती है कि कौन अपना है और कौन पराया। सवाल है कि हजारों वर्षों से अनेक भाषाओं को साथ लेकर चलने वाले देश में बार-बार विवाद क्यों?
मंजिल का मार्ग । भाषा को लेकर हिंदू दृष्टिकोण कभी श्रेष्ठता का नहीं रहा। ऋग्वेद में वाणी को अनेक रूपों में व्यक्त होने वाली शक्ति माना गया है। भर्तृहरि ने भी शब्द को परम सत्य से जोड़ा। ऐसे में भाषा किसी समुदाय की बाड़ नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचने का एक मार्ग है। जब आदि शंकराचार्य केरल से निकले, उन्होंने भारत की परिक्रमा दो बार की और चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित किए। इस यात्रा में हर कुछ सौ किमी पर भाषा बदलती थी, फिर भी उन्हें कहीं कोई अवरोध नहीं मिला। बाद में तमिलनाडु से निकले रामानुजाचार्य की यात्राओं में भी यही स्थिति रही। सदियों पुरानी चारधाम परंपरा में भी भाषा कभी बड़ी रुकावट नहीं बनी।साझा मूल्य । ये उदाहरण बताते हैं कि भारत में भाषा ऐतिहासिक रूप से जोड़ने और ज्ञान का माध्यम रही है, विभाजन का नहीं। वास्तव में, भारत की सभी भाषाओं का मूल साहित्य आश्चर्यजनक रूप से एक-दूसरे से मिलता-जुलता है - धर्म, मोक्ष, ज्ञान, राम, कृष्ण, शिव और शक्ति जैसे विषय हर भाषा में गूंजते हैं। भारत की भाषाएं क्षेत्रीय समृद्धि और एक साझा सभ्यतागत मूल्य बोध, दोनों की अभिव्यक्ति रही हैं।
देश की पहचान । इन भाषाओं की कहानियां इस विविधता को समझने के लिए काफी हैं। रामायण संस्कृत से लेकर तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, अवधी और मराठी सहित अनेक भाषाओं में कही गई है। भगवद्गीता को भी ज्ञानेश्वर ने मराठी में उतनी ही श्रद्धा से प्रस्तुत किया। आज संविधान में 22 भाषाओं को आधिकारिक दर्जा है और देश में 100 से अधिक प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं। भाषा, संस्कृति, कला, भोजन और वेशभूषा की यह विविधता भारत की एकात्मता की पहचान है।
बेकार का डर । इसीलिए हर नागरिक को यह चिंता होनी चाहिए कि भाषा को आज राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है। जब कोई नेता किसी एक भाषा को राज्य की ‘असली’ पहचान और दूसरी को बाहरी या थोपी हुई बताता है, तो यह हमारी सभ्यतागत सोच की रक्षा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय गौरव के नाम पर उधार ली गई सोच है। आम लोगों को एक-दूसरे की भाषाओं से उतना डर नहीं, जितना ऐसे टकराव भड़काने वाले लोग जताते हैं।