Netajis Hmm Future Of Hindi Or A Way To Fund Sons Fees
हिंदी और हम्म
नवभारतटाइम्स.कॉम•
नेता जी हिंदी पर भाषण दे रहे थे। भाषण जोरदार होने की श्रेणी में आने ही वाला था कि उन्हें अमेरिका में पढ़ने वाले अपने बेटे की फीस की चिंता सताने लगी। उन्होंने तुरंत घोषणा की, ' विदेश में हिंदी के प्रचार के लिए हम एक समिति बना रहे हैं। समिति के लिए अपने संसदीय कोष से एक करोड़ रुपये देंगे।'
भाषण देकर नेता जी घर लौटे और अपने चेले से कहा, 'तुम तो हिंदी के जानकार हो। यह बताओ, विदेश में हिंदी का क्या भविष्य है?' चेला हिंदी का शोधार्थी था। नेता जी के सवाल पर उसने मन ही मन खुद को आभासी आईने में देखा और कहा, 'हम्म।' नेता जी ने पूछा, 'यह हिंदी का हम्म है या वॅट्सऐप पर लिखा जाने वाला?' 'हम्म असल में विस्मयादिबोधक है। विस्मय की भाषा क्या ही हो सकती है? इसे आप दोनों में मान लें।' नेता जी के चेहरे पर चिंतन के भाव आए। वह कई बातें कहना चाहते थे, पर निकला, 'हम्म!' थोड़ा और चिंतन करने के बाद उन्होंने कहा, 'अंग्रेजी के विस्मयादिबोधक ओह, वॉव आदि होते हैं।' चेले के चेहरे पर ज्ञान का ओज आ गया। वह बोला, 'मानिए, आपको किसी की मृत्यु की खबर मिलती है और आपके मुंह से निकलता है, ओह। यह हिंदी का ओह है या अंग्रेजी का?' नेता जी ने माथे पर लटक आई लट को उंगली में फंसा कर घुमाया और कहा, 'हम्म।' चेले को एहसास हुआ कि नेता जी उसके बौद्धिक अर्दब में आ गए हैं। उसने मुख्य सवाल पर वापसी की, ' हिंदी का भविष्य भी हम्म जैसा है। जिसका जैसा मन हो वैसा अर्थ निकाल ले।' तब तक नेता जी के अकाउंटेंट ने बताया, 'बाबा की फीस जमा हो गई है।' नेता जी चेले की ओर देखकर मुस्काए और बोले, 'हम्म।'