Ganeshotsav Symbol Of Social Revolution And National Consciousness
गणेशोत्सव से समाजसेवा
नवभारतटाइम्स.कॉम•
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने सामाजिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप से कुछ दूरी बना ली थी। फिर भी ऐसे आयोजनों पर उनकी निगरानी और रोक-टोक जारी रही। अंग्रेजी शासन के प्रतिबंधों के कारण लोग सार्वजनिक आयोजन करने से डरते थे। ऐसे समय में पुणे के राजसी चिकित्सक डॉ. भाऊसाहब रंगारी सामने आए। उन्होंने स्वयं लकड़ी से भगवान गणेश की प्रतिमा बनाई। इसमें गणेश को राक्षस का वध करते हुए दिखाया गया था। राजसी चिकित्सक होने के बावजूद वह आम लोगों का इलाज करते थे। इसलिए विभिन्न जातियों और धर्मों के लोगों से उनके आत्मीय संबंध थे। उन्होंने गणेशोत्सव में सभी को आमंत्रित किया। यह उत्सव सामाजिक जागृति और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनने लगा। 1893 में केसरी के संपादक बाल गंगाधर तिलक ने अपने संपादकीय में गणेशोत्सव को व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप देने की आवश्यकता पर बल दिया। आज भी पुणे में वह ऐतिहासिक प्रतिमा संरक्षित है। श्रीमंत भाऊसाहब रंगारी ट्रस्ट की तरफ से हर साल गणेश उत्सव का आयोजन किया जाता है।