आतंकवाद पर भारत का यूएनएससी में कड़ा रुख, पाकिस्तान पर साधा निशाना

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संयुक्त राष्ट्र, 20 अगस्त (आईएएनएस)। भारत ने आतंकवाद से निपटने में पाकिस्तान की भूमिका पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) से कहा है कि किसी संगठन को आतंकवादी घोषित करने या सूची से हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए और इसे किसी भी देश के निजी राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी मिशन की प्रभारी योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर हुई एक खुली बहस में यह बात कही। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में अपनी जगह का इस्तेमाल आतंकवादियों को सूची से हटाकर उन्हें सही ठहराने या बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ राजनीतिक कारणों से दूसरे संगठनों को आतंकवादी घोषित करने के लिए नहीं होना चाहिए।

योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की उन सहायक समितियों की स्थिति पर भी चिंता जताई, जो आतंकवाद और प्रतिबंधों से जुड़े मामलों को देखती हैं। उन्होंने बताया कि परिषद के सदस्यों के बीच चल रहे मतभेदों के कारण इन समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति अब तक नहीं हो पाई है, जिससे उनका काम रुक गया है। आतंकवादियों को सूची में डालने या हटाने की प्रक्रिया और विभिन्न पैनलों के अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से गोपनीयता बरती जाती रही है। इस साल पाकिस्तान और चीन ने बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और मजीद ब्रिगेड को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल कराने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने ऐसा नहीं होने दिया।
पाकिस्तान, जो सुरक्षा परिषद का निर्वाचित सदस्य है, उन कुछ आतंकियों और आतंकी संगठनों को प्रतिबंध सूची से हटाने की कोशिश कर रहा है जिन्हें वह अपने देश में पनाह देता है। वहीं, चीन ने सालों तक जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर और लश्कर-ए-तैयबा के नेता साजिद मीर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रयासों को रोका था। योजना पटेल ने जोर देकर कहा, "सुरक्षा परिषद की सदस्यता के साथ बड़ी जिम्मेदारियां आती हैं। इसे किसी भी देश को अपने छोटे-मोटे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने का मंच नहीं बनाना चाहिए।"

उन्होंने आतंकवादी समूहों और उनके नेताओं को सूचीबद्ध करने और सूची से हटाने की प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि इस पूरी व्यवस्था में और अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने की जरूरत है। पटेल ने यह भी बताया कि आठ महीने बीत जाने के बाद भी सुरक्षा परिषद आतंकवाद-रोधी और प्रतिबंध संबंधी अपनी सहायक समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं कर पाई है। इसका मुख्य कारण पाकिस्तान का प्रतिबंध समिति का नेतृत्व करने की इच्छा बताया जा रहा है। परिषद में ऐसे मामलों पर सभी की सहमति जरूरी होने के कारण गतिरोध बना हुआ है।

पटेल ने कहा, "हाल के समय में इन समितियों का काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाया है, जिसका मुख्य कारण अध्यक्षों की नियुक्ति में हुई देरी है।" भारत ने सुरक्षा परिषद से इस मुद्दे का जल्द से जल्द समाधान निकालने और समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। पटेल ने कहा कि सहायक निकायों के अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए "स्पष्ट, अंतिम और गैर-परक्राम्य समयसीमा" तय की जानी चाहिए।

जापान ने भी इन नियुक्तियों में हो रही देरी पर गहरी चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र में जापान के उप-स्थायी प्रतिनिधि मिकानागी तोमोहिरो ने कहा कि उनका देश संतुलित, पारदर्शी, प्रभावी और समावेशी परामर्श के माध्यम से बिना किसी और देरी के सहमति बनाने का आग्रह करता है।

पटेल ने शांति स्थापना अभियानों से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद के फैसलों और उन देशों की जमीनी हकीकत के बीच अंतर है, जो इन अभियानों के लिए सैनिक और पुलिसकर्मी भेजते हैं। उन्होंने कहा कि शांति स्थापना मिशनों में योगदान देने वाले देश सिर्फ सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों तक सीमित नहीं हैं, इसलिए उन्हें भी शांति स्थापना से जुड़े प्रमुख मुद्दों, जैसे कि मिशन का जनादेश (काम) और संसाधन, पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।

पटेल ने सुरक्षा परिषद की कमियों के लिए उसकी पुरानी संरचना को जिम्मेदार ठहराया, जो दूसरे विश्व युद्ध के 80 साल पुराने नतीजों पर आधारित है। उन्होंने भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग को दोहराते हुए परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की सदस्यता बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार केवल "टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस" (लिखित बातचीत) के माध्यम से ही संभव है, जिनमें स्पष्ट लक्ष्य और समयसीमा तय हो।

यह ध्यान देने योग्य है कि "अंतर-सरकारी वार्ताओं" (आईजीएन) के नाम से चल रही सुधार प्रक्रिया में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान सहित कुछ देशों का एक छोटा समूह, जिसका नेतृत्व इटली कर रहा है, प्रक्रियागत उपायों का इस्तेमाल करके बातचीत के पाठ को अपनाने की प्रक्रिया को बाधित कर रहा है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में आतंकवाद से निपटने के मामले में पाकिस्तान की भूमिका पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाते हुए कहा है कि किसी संगठन को आतंकवादी घोषित करने या सूची से हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए और इसे किसी भी देश के निजी राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी मिशन की प्रभारी योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर हुई एक खुली बहस में यह महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सुरक्षा परिषद में अपनी जगह का इस्तेमाल आतंकवादियों को सूची से हटाकर उन्हें सही ठहराने या बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ राजनीतिक कारणों से दूसरे संगठनों को आतंकवादी घोषित करने के लिए नहीं होना चाहिए।

योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की उन सहायक समितियों की स्थिति पर भी गहरी चिंता व्यक्त की, जो आतंकवाद और प्रतिबंधों से जुड़े मामलों को देखती हैं। उन्होंने बताया कि परिषद के सदस्यों के बीच चल रहे मतभेदों के कारण इन समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति अब तक नहीं हो पाई है, जिससे उनका महत्वपूर्ण काम रुक गया है। आतंकवादियों को सूची में डालने या हटाने की प्रक्रिया और विभिन्न पैनलों के अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से गोपनीयता बरती जाती रही है, जो पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है। इस साल पाकिस्तान और चीन ने बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और मजीद ब्रिगेड को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल कराने की पुरजोर कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने इसे सफल नहीं होने दिया।

यह भी सामने आया है कि पाकिस्तान, जो सुरक्षा परिषद का निर्वाचित सदस्य है, उन कुछ आतंकियों और आतंकी संगठनों को प्रतिबंध सूची से हटाने की कोशिश कर रहा है जिन्हें वह अपने देश में पनाह देता है। यह एक गंभीर आरोप है जो पाकिस्तान की आतंकवाद के प्रति दोहरी नीति को उजागर करता है। वहीं, चीन ने सालों तक जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर और लश्कर-ए-तैयबा के नेता साजिद मीर जैसे खूंखार आतंकवादियों को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रयासों को लगातार रोका था, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कमजोर हुई है।

योजना पटेल ने इस संदर्भ में जोर देकर कहा कि "सुरक्षा परिषद की सदस्यता के साथ बड़ी जिम्मेदारियां आती हैं। इसे किसी भी देश को अपने छोटे-मोटे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने का मंच नहीं बनाना चाहिए।" उन्होंने आतंकवादी समूहों और उनके नेताओं को सूचीबद्ध करने और सूची से हटाने की प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि इस पूरी व्यवस्था में और अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने की सख्त जरूरत है। पटेल ने यह भी बताया कि आठ महीने बीत जाने के बाद भी सुरक्षा परिषद आतंकवाद-रोधी और प्रतिबंध संबंधी अपनी सहायक समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं कर पाई है। इसका मुख्य कारण पाकिस्तान का प्रतिबंध समिति का नेतृत्व करने की इच्छा बताया जा रहा है, जो इस प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। परिषद में ऐसे मामलों पर सभी की सहमति जरूरी होने के कारण गतिरोध बना हुआ है।

पटेल ने कहा, "हाल के समय में इन समितियों का काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाया है, जिसका मुख्य कारण अध्यक्षों की नियुक्ति में हुई देरी है।" भारत ने सुरक्षा परिषद से इस मुद्दे का जल्द से जल्द समाधान निकालने और समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। पटेल ने कहा कि सहायक निकायों के अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए "स्पष्ट, अंतिम और गैर-परक्राम्य समयसीमा" तय की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी देरी न हो। जापान ने भी इन नियुक्तियों में हो रही देरी पर गहरी चिंता जताई है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है। संयुक्त राष्ट्र में जापान के उप-स्थायी प्रतिनिधि मिकानागी तोमोहिरो ने कहा कि उनका देश संतुलित, पारदर्शी, प्रभावी और समावेशी परामर्श के माध्यम से बिना किसी और देरी के सहमति बनाने का आग्रह करता है।

पटेल ने शांति स्थापना अभियानों से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद के फैसलों और उन देशों की जमीनी हकीकत के बीच अक्सर अंतर होता है, जो इन अभियानों के लिए सैनिक और पुलिसकर्मी भेजते हैं। उन्होंने कहा कि शांति स्थापना मिशनों में योगदान देने वाले देश सिर्फ सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों तक सीमित नहीं हैं, इसलिए उन्हें भी शांति स्थापना से जुड़े प्रमुख मुद्दों, जैसे कि मिशन का जनादेश (काम) और संसाधन, पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है जो शांति स्थापना अभियानों की प्रभावशीलता को बढ़ा सकता है।

पटेल ने सुरक्षा परिषद की कमियों के लिए उसकी पुरानी संरचना को जिम्मेदार ठहराया, जो दूसरे विश्व युद्ध के 80 साल पुराने नतीजों पर आधारित है। उन्होंने भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग को दोहराते हुए परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की सदस्यता बढ़ाने की वकालत की। उनका मानना है कि एक आधुनिक और प्रभावी सुरक्षा परिषद के लिए इसका विस्तार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार केवल "टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस" (लिखित बातचीत) के माध्यम से ही संभव है, जिनमें स्पष्ट लक्ष्य और समयसीमा तय हो। यह एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है जो सुधार प्रक्रिया को गति दे सकता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि "अंतर-सरकारी वार्ताओं" (आईजीएन) के नाम से चल रही सुधार प्रक्रिया में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान सहित कुछ देशों का एक छोटा समूह, जिसका नेतृत्व इटली कर रहा है, प्रक्रियागत उपायों का इस्तेमाल करके बातचीत के पाठ को अपनाने की प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। यह स्थिति सुरक्षा परिषद को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है।