नर्मदा जल विवाद सुलझा: मध्य प्रदेश को गुजरात से मिलेंगे 217 करोड़, दशकों पुराने मुद्दे पर समाधान

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भोपाल, 8 जुलाई। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल का नर्मदा जल विवाद सुलझाने में मदद करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा किया है। यह दशकों पुराना विवाद आखिरकार सुलझ गया है। सीएम मोहन यादव ने बताया कि मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच लंबे समय से चल रहे इस मामले में फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल की राय आने के बाद एक समाधान निकला। यह राय पुनर्वास की लागत को आपस में बांटने से जुड़ी थी। इससे पहले, मध्य प्रदेश पर इस मद में करीब 1,500 करोड़ रुपये का भारी बोझ था।

मंगलवार को नई दिल्ली में हुई एक अहम बैठक के बाद यह तय हुआ कि गुजरात अब 50 प्रतिशत की बजाय 75 प्रतिशत लागत वहन करेगा। इससे मध्य प्रदेश का हिस्सा घटकर सिर्फ 217 करोड़ रुपये रह जाएगा। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री चैतन्य कुमार कश्यप ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सीएम यादव ने मंत्रिपरिषद की बैठक के दौरान यह बात बताई। यह बांध असल में गुजरात में है, लेकिन इसके जलाशय से पानी ऊपर की ओर बसे राज्यों में भी जमीन डुबोता है। इसी वजह से नदी के फायदे और लागत को बांटने के लिए नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया था।
साल 1979 में न्यायाधिकरण ने अपना फैसला सुना दिया था, लेकिन इसके बावजूद लागत-बंटवारे की व्यवस्था, पुनर्वास का खर्च और राज्यों के बीच मुआवजे को लेकर विवाद दशकों तक अनसुलझे रहे। आखिरकार, केंद्रीय मंत्रालयों की मध्यस्थता से इस लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे को सुलझा लिया गया। मुख्य विवाद जमीन अधिग्रहण, निर्माण के लिए लिए गए कर्ज, पुनर्वास और लोगों को बसाने पर होने वाले भारी खर्च को आपस में बांटने को लेकर था।

इस अंतिम समझौते के तहत, पुराने बकाया को काफी हद तक माफ कर दिया गया है या फिर से व्यवस्थित किया गया है, ताकि एक व्यापक और स्थायी समाधान निकल सके। मध्य प्रदेश ने बांध परियोजना से डूबने वाले इलाकों के असर के लिए ऐतिहासिक रूप से लगभग 7,669 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी। लेकिन अब, अंतिम समझौते के तहत, मध्य प्रदेश सरकार सभी लंबित आपसी दायित्वों को निपटाने के लिए गुजरात को एकमुश्त 217 करोड़ रुपये का भुगतान करेगी।

इस परियोजना से सिंचाई और पीने के पानी का सबसे बड़ा फायदा गुजरात को ही मिल रहा है। इसलिए, गुजरात ने सबसे बड़ा वित्तीय बोझ उठाया है और अब वह इस विवाद से जुड़े किसी भी लंबित मुकदमे के बिना आगे बढ़ सकता है। राजस्थान, जिसे नर्मदा के पानी से सिंचाई और कृषि विकास का भी लाभ मिला है, उसने भी इस व्यापक समझौते के तहत लागत-बंटवारे के अपने दायित्वों को पूरा कर लिया है।

यह समझना ज़रूरी है कि 1979 के मूल नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले के अनुसार, गुजरात को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे ऊपर की ओर स्थित राज्यों में पुनर्वास और बसावट के साथ-साथ जमीन अधिग्रहण पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा उठाना था। लेकिन सालों तक चले विवादों के कारण यह व्यवस्था ठीक से लागू नहीं हो पा रही थी।

इस विवाद का इतिहास काफी पुराना है। नर्मदा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच हमेशा से ही कुछ न कुछ खींचतान चलती रही है। बांध बनने के बाद, जिन राज्यों की जमीनें पानी में डूब गईं, उन्हें मुआवजा मिलना था। साथ ही, बांध के निर्माण और उससे जुड़े विकास कार्यों का खर्च भी राज्यों को आपस में बांटना था। लेकिन यह बंटवारा कभी भी पूरी तरह से संतोषजनक नहीं रहा। गुजरात, जो बांध का मुख्य लाभार्थी है, उस पर हमेशा से ही ज्यादा जिम्मेदारी रही है। वहीं, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों को अपनी जमीनें गंवाने का मुआवजा और पुनर्वास का खर्च उठाना पड़ता था।

इस बार, केंद्र सरकार के दखल से एक ऐसा समझौता हुआ है, जिससे सभी राज्यों को राहत मिली है। गुजरात को अब ज्यादा भुगतान करना होगा, जिससे मध्य प्रदेश पर बोझ काफी कम हो गया है। यह एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इस विवाद के कारण विकास कार्य भी प्रभावित हो रहे थे। अब जब यह विवाद सुलझ गया है, तो उम्मीद है कि नर्मदा नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा और संबंधित राज्यों में विकास की गति तेज होगी। यह समझौता न केवल वित्तीय बोझ को कम करता है, बल्कि राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को भी मजबूत करेगा।

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