भूतिया जगहों का वैज्ञानिक रहस्य: इन्फ़्रासाउंड से डर का खुलासा

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पुरानी और वीरान जगहों पर महसूस होने वाला डर अब रहस्य नहीं रहा। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि यह डर इन्फ़्रासाउंड नामक अदृश्य ध्वनि तरंगों के कारण होता है। ये तरंगें इंसानी कान सुन नहीं पाते, पर शरीर पर गहरा असर डालती हैं।

Navbharat Times
फ़िल्मों और कहानियों में अक्सर हम देखते हैं कि लोग पुरानी, खंडहर जैसी जगहों पर जाते ही डर जाते हैं। हवा में अजीब सी सरसराहट, दिल की धड़कन का तेज़ हो जाना, और ऐसा महसूस होना जैसे कोई आस-पास है, ये सब अनुभव लोगों को बेचैन कर देते हैं। सदियों से लोग इन डरावने अनुभवों को भूत-प्रेत या किसी अलौकिक शक्ति का असर मानते आए हैं। लेकिन अब, वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठा दिया है। उनकी नई रिसर्च के मुताबिक, इन डरावने अनुभवों के पीछे कोई आत्मा नहीं, बल्कि एक खास तरह की अनसुनी आवाज़ है।

वैज्ञानिकों ने डरावनी और वीरान जगहों पर जाकर एक खास रिसर्च की। उन्होंने पाया कि पुरानी इमारतों में जो 'इन्फ़्रासाउंड' (infrasound) होता है, वही असल में लोगों में डर पैदा करता है। इन्फ़्रासाउंड बहुत कम फ़्रीक्वेंसी वाली ध्वनि तरंगें होती हैं, जो 20 Hz से भी कम होती हैं। हमारा कान इन आवाज़ों को सीधे तौर पर सुन नहीं सकता। लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि भले ही हम इन्हें सुन न सकें, ये तरंगें हमारे शरीर और दिमाग पर बहुत गहरा असर डालती हैं।
तो सवाल यह उठता है कि ये तरंगें पुरानी और वीरान इमारतों में ही क्यों पैदा होती हैं? वैज्ञानिक बताते हैं कि पुरानी इमारतों में टूटी-फूटी पाइपलाइनें, पुराने वेंटिलेशन सिस्टम, बंद पड़े बॉयलर और जंग लगी मशीनें हवा के दबाव में बदलाव के कारण बहुत कम फ़्रीक्वेंसी वाली कंपन पैदा करती हैं। रात के सन्नाटे में, जब बाहर का शोरगुल बंद हो जाता है, तो इन पुरानी चीज़ों से निकलने वाले लगातार, अदृश्य कंपन आस-पास मौजूद लोगों के मूड और उनके नर्वस सिस्टम पर बुरा असर डालना शुरू कर देते हैं।

इस रहस्यमयी विषय पर कनाडा की मैकएवन यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर रॉडनी श्माल्ट्ज़ के नेतृत्व में एक दिलचस्प अध्ययन हुआ। इस वैज्ञानिक बात को परखने के लिए, शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग किया जिसमें 36 लोगों ने हिस्सा लिया। ये सभी लोग एक बंद कमरे में बैठे थे जहाँ सामान्य संगीत बज रहा था। लेकिन, प्रयोग के दौरान, कुछ लोगों को चुपके से 18 Hz की इन्फ़्रासाउंड तरंगों के संपर्क में लाया गया। ये तरंगें इंसानी कान के लिए पूरी तरह से अनसुनी थीं।

प्रयोग के बाद, शोधकर्ताओं ने सभी प्रतिभागियों की भावनाओं का जायजा लिया और उनके लार के सैंपल का भी विश्लेषण किया। इस वैज्ञानिक जाँच के नतीजे वाकई चौंकाने वाले थे। जिन लोगों को अनजाने में इन्फ़्रासाउंड (बहुत कम फ़्रीक्वेंसी वाली आवाज़) के संपर्क में लाया गया था, उनके शरीर में तनाव हार्मोन 'कोर्टिसोल' का स्तर काफी बढ़ा हुआ पाया गया। इन लोगों ने बताया कि प्रयोग के दौरान उन्हें अचानक बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ापन, घबराहट, डर और बेचैनी महसूस हुई, जबकि इसका कोई बाहरी कारण नहीं था।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पूरी घटना हमारे अवचेतन मन और हमारे आस-पास के माहौल के बीच के तालमेल से होती है। इससे यह पता चलता है कि खंडहरों में महसूस होने वाला गहरा खौफ असल में भूतों या प्रेतों की मौजूदगी का संकेत नहीं है। बल्कि, यह उन अदृश्य कंपनों के प्रति हमारे शरीर की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो उस माहौल में मौजूद होते हैं।

यह रिसर्च इस बात पर ज़ोर देती है कि जिन जगहों पर इन्फ़्रासाउंड का स्तर ज़्यादा होता है, वहाँ लोगों को अजीबोगरीब और डरावने अनुभव हो सकते हैं। ये अनुभव किसी अलौकिक शक्ति के कारण नहीं, बल्कि भौतिक कारणों से होते हैं। इन्फ़्रासाउंड, जिसे हम सुन नहीं सकते, हमारे शरीर के अंदरूनी हिस्सों पर असर डालता है, जिससे हमें बेचैनी और डर महसूस होता है।

पुरानी इमारतों में इन्फ़्रासाउंड पैदा होने के कई कारण हो सकते हैं। जैसे कि हवा का किसी संकरे रास्ते से गुज़रना, या किसी चीज़ का कंपन करना। जब ये कंपन बहुत कम फ़्रीक्वेंसी के होते हैं, तो वे इन्फ़्रासाउंड कहलाते हैं। ये तरंगें हमारे शरीर में गूंज पैदा कर सकती हैं, जिससे हमें असहज महसूस होता है।

इस रिसर्च से यह भी पता चलता है कि हमारा दिमाग और शरीर कैसे बाहरी वातावरण से प्रभावित होते हैं, भले ही हमें उसका सीधा एहसास न हो। इन्फ़्रासाउंड एक ऐसा ही उदाहरण है, जो दिखाता है कि कैसे अनसुनी आवाज़ें भी हमारे मन और शरीर पर गहरा असर डाल सकती हैं।

तो अगली बार जब आप किसी पुरानी, खंडहर जैसी जगह पर जाएँ और आपको डर लगे, तो शायद यह किसी भूत का डर न हो, बल्कि वहाँ मौजूद इन्फ़्रासाउंड का असर हो। यह एक वैज्ञानिक व्याख्या है जो सदियों पुराने रहस्य को सुलझाती है और हमें प्रकृति के उन अनजाने पहलुओं से रूबरू कराती है जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।

यह रिसर्च हमें यह भी सिखाती है कि हमें हर चीज़ को सिर्फ़ अंधविश्वास के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। विज्ञान हमें हर चीज़ के पीछे का कारण जानने में मदद करता है। इन्फ़्रासाउंड का यह मामला इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जो बताता है कि कैसे वैज्ञानिक खोजें हमारे डर और हमारी समझ को बदल सकती हैं।

इस तरह, जो अनुभव पहले डरावने और रहस्यमयी लगते थे, अब वे वैज्ञानिक तर्क के आधार पर समझे जा सकते हैं। यह रिसर्च हमें यह भी बताती है कि हमें अपने आसपास के माहौल के प्रति ज़्यादा जागरूक रहना चाहिए, क्योंकि कई बार अनजाने में ही हम ऐसी चीज़ों के संपर्क में आ जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य और मन पर असर डाल सकती हैं।

यह अध्ययन हमें यह भी बताता है कि कैसे हमारा शरीर कुछ खास तरह की ध्वनियों के प्रति प्रतिक्रिया करता है, भले ही हम उन्हें सुन न सकें। यह हमारे शरीर की जटिलता और हमारे आसपास की दुनिया के साथ हमारे गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

अंत में, यह रिसर्च एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि डर हमेशा किसी अलौकिक शक्ति का परिणाम नहीं होता। कई बार यह हमारे अपने शरीर की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है, जो हमारे आसपास के भौतिक वातावरण से प्रभावित होती है। यह हमें अपने डर को वैज्ञानिक तरीके से समझने और उसका सामना करने में मदद करता है।