अफ्रीका में इबोला से लड़ने के लिए नई संयुक्त टीम लॉन्च, स्वास्थ्य आपातकाल से निपटने की क्षमता मजबूत

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Navbharat Times
अफ्रीका में इबोला के बढ़ते खतरे को देखते हुए, अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (अफ्रीका सीडीसी), विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और युगांडा सरकार ने मिलकर एक खास टीम बनाई है। इस टीम का नाम 'जॉइंट कॉन्टिनेंटल इंसिडेंट मैनेजमेंट सपोर्ट टीम' (आईएमएसटी) है। इसे शनिवार देर रात लॉन्च किया गया है। इसका मुख्य काम पूरे अफ्रीका महाद्वीप में स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थितियों से निपटने की ताकत को बढ़ाना है। यह टीम युगांडा, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और आसपास के उन देशों की मदद करेगी जहाँ इबोला का खतरा है। यह टीम 'एक टीम, एक योजना और एक बजट' के सिद्धांत पर काम करेगी और बीमारी के फैलने से रोकने के लिए कई तरह के विशेषज्ञों को एक साथ लाएगी।

अफ्रीका सीडीसी ने बताया कि यह नई आईएमएसटी एक ऐसा साझा प्लेटफॉर्म तैयार करती है जो अफ्रीका की सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों की तैयारी, तालमेल और उनसे निपटने की क्षमता को मजबूत करता है। यह बंडिबुग्यो इबोला वायरस बीमारी से लड़ने के मौजूदा प्रयासों में भी मदद करेगी। युगांडा की राजधानी कंपाला में मकेरेरे यूनिवर्सिटी में इस टीम को लॉन्च किया गया। यह टीम एकीकृत तकनीकी सहायता, ऑपरेशनल समन्वय और कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों की मदद से सहयोग देगी।
अफ्रीका सीडीसी ने कहा, "यह लॉन्च अफ्रीका के सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है।" उन्होंने आगे कहा, "यह अफ्रीका सीडीसी, डब्ल्यूएचओ और अफ्रीकी संघ (एयू) के सदस्य देशों की उस साझा प्रतिबद्धता को दिखाता है जिसके तहत वे तेज़ी से, बेहतर समन्वय के साथ और देशों के नेतृत्व में जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों से निपटने की तैयारी कर रहे हैं।"

एयू की विशेष सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ने बताया कि यह नया प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय तैयारी और सीमा-पार सहयोग को अफ्रीका की स्वास्थ्य सुरक्षा के जरूरी स्तंभों के तौर पर मजबूत करता है। यह एजेंसी बताती है कि आईएमएसटी निगरानी, प्रयोगशाला प्रणालियों, केस मैनेजमेंट, संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण, आपातकालीन लॉजिस्टिक्स और संचालन, जोखिम संचार, सूचना प्रबंधन और पार्टनर समन्वय के विशेषज्ञों को एक साथ लाती है। इसका मकसद पूरे क्षेत्र में बीमारी के प्रकोप से निपटने की क्षमता को मजबूत करना है। सिन्हुआ समाचार एजेंसी ने यह जानकारी दी है।

इबोला एक बहुत ही खतरनाक और जानलेवा वायरल बीमारी है। यह इंसानों और बंदरों जैसे अन्य प्राइमेट्स को अपनी चपेट में लेती है। यह वायरस चमगादड़, साही और गैर-मानव प्राइमेट्स जैसे जंगली जानवरों से इंसानों में फैलता है। फिर यह संक्रमित लोगों के खून, शरीर के तरल पदार्थ या अंगों के सीधे संपर्क से फैलता है। इसके अलावा, इन तरल पदार्थों से दूषित सतहों और चीजों, जैसे बिस्तर और कपड़े, के संपर्क में आने से भी यह इंसानों में फैल सकता है।

इबोला बीमारी में मरने वालों की औसत दर (केस फेटैलिटी रेट) लगभग 50 प्रतिशत है। पिछले प्रकोपों में यह दर 25 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक रही है। इबोला बीमारी का पहला प्रकोप मध्य अफ्रीका के दूरदराज के गांवों में हुआ था, जो उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के पास थे।

पश्चिम अफ्रीका में 2014-2016 के दौरान फैला इबोला वायरस का प्रकोप, 1976 में इस वायरस की खोज के बाद से अब तक का सबसे बड़ा और सबसे जटिल प्रकोप था। इस प्रकोप में बाकी सभी प्रकोपों की तुलना में कहीं ज़्यादा मामले सामने आए और मौतें हुईं। यह प्रकोप कई देशों में भी फैला। इसकी शुरुआत गिनी से हुई और फिर यह जमीनी सीमाओं के जरिए सिएरा लियोन और लाइबेरिया तक पहुंच गया।

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