ई. श्रीधरन: भारत के 'मेट्रो मैन' की विकास गाथा और प्रेरणादायक जीवन
ई. श्रीधरन: भारत के 'मेट्रो मैन' की विकास गाथा और प्रेरणादायक जीवन
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ई. श्रीधरन, जिन्हें 'मेट्रो मैन' कहा जाता है, ने भारत के बुनियादी ढांचे को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पम्बन पुल और कोंकण रेलवे जैसी परियोजनाओं को समय पर पूरा किया। दिल्ली मेट्रो के निर्माण में उनके नेतृत्व ने देश भर के शहरों को प्रेरित किया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे।
नई दिल्ली, 11 जून: भारत के महान अभियंता ई. श्रीधरन, जिन्हें 'मेट्रो मैन' के नाम से जाना जाता है, ने अपने असाधारण कौशल, अनुशासन और नेतृत्व से देश के बुनियादी ढांचे को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। 12 जून 1932 को केरल में जन्मे श्रीधरन ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और स्पष्ट कार्यप्रणाली से असंभव लगने वाले सपनों को साकार किया। उन्होंने न केवल सड़कों और पुलों का निर्माण किया, बल्कि राष्ट्र की दिशा और गति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सबसे बड़ी पहचान निर्धारित समय सीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण काम पूरा करना है, जिसने भारत की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया।
ई. श्रीधरन का जन्म 12 जून 1932 को केरल के करुकापुथुर में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा पलक्कड़ जिले के पट्टांबी के पास सरकारी लोअर प्राइमरी स्कूल, चथन्नूर में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने बेसल इवेंजेलिकल मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल से अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए वे पालघर के विक्टोरिया कॉलेज गए। अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री उन्होंने काकीनाडा के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग में हासिल की। श्रीधरन का जीवन इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि अगर किसी काम को करने का पक्का इरादा हो और काम करने का सही तरीका पता हो, तो मुश्किल से मुश्किल काम भी आसान हो जाता है।श्रीधरन की कार्यशैली की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे जो भी काम हाथ में लेते थे, उसे तय समय से पहले और बहुत ही बढ़िया तरीके से पूरा करते थे। इसी खूबी की वजह से उन्होंने भारत में सार्वजनिक परिवहन का चेहरा ही बदल दिया। एक बार साल 1963 में रामेश्वरम और तमिलनाडु को जोड़ने वाला पम्बन पुल टूट गया था। रेलवे ने इस पुल को दोबारा बनाने के लिए छह महीने का समय तय किया था। लेकिन बाद में यह समय सीमा घटाकर सिर्फ तीन महीने कर दी गई और इस बड़ी जिम्मेदारी को ई. श्रीधरन को सौंपा गया। श्रीधरन ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कमाल कर दिया! उन्होंने सिर्फ 45 दिनों में ही पुल का पुनर्निर्माण पूरा कर दिया। यह उनकी असाधारण क्षमता और नेतृत्व का पहला बड़ा उदाहरण था।
उनकी एक और बहुत बड़ी उपलब्धि कोंकण रेलवे परियोजना रही। यह भारत के पश्चिमी तट के किनारे 760 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन बिछाने का काम था। यह काम बिल्कुल भी आसान नहीं था। रास्ता बहुत मुश्किल था, 150 से ज्यादा पुल बनाने थे और कई तरह की तकनीकी दिक्कतें भी थीं। लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद, श्रीधरन और उनकी टीम ने इस परियोजना को सिर्फ सात सालों में पूरा कर दिखाया। यह वाकई एक अविश्वसनीय उपलब्धि थी।
साल 1995 में ई. श्रीधरन दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) के प्रबंध निदेशक बने। उनके नेतृत्व में दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन का सपना एक हकीकत बन गया और यह एक वैश्विक सफलता की कहानी बन गई। 1995 से 2012 तक दिल्ली मेट्रो का नेतृत्व करते हुए, उन्होंने पहले चरण का निर्माण तय समय से पहले और बजट के अंदर पूरा कर दिखाया। दिल्ली मेट्रो की इस शानदार सफलता ने देश के दूसरे शहरों को भी प्रेरित किया। लखनऊ मेट्रो, कोच्चि मेट्रो जैसी परियोजनाओं के लिए दिल्ली मेट्रो एक मिसाल बन गई। जयपुर और हैदराबाद जैसे शहरों ने भी मेट्रो रेल नेटवर्क बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। कोलकाता मेट्रो की योजना को साकार करने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।
श्रीधरन ने सिर्फ सरकारी परियोजनाओं को ही नहीं संभाला, बल्कि उन्होंने देश के विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी अपनी राय दी। वे सेवानिवृत्त होने के बाद भी राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाहकार और एक प्रमुख विचारक के रूप में सक्रिय रहे। वर्ष 2015 में, संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की-मून ने उन्हें सतत परिवहन पर संयुक्त राष्ट्र के उच्चस्तरीय सलाहकार समूह (HLAG-ST) का सदस्य नियुक्त किया। यह उनके काम और विशेषज्ञता का एक बड़ा सम्मान था।
देश और दुनिया ने ई. श्रीधरन के योगदान को कई बड़े सम्मानों से नवाजा है। भारत सरकार ने उन्हें साल 2001 में पद्म श्री और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। फ्रांस सरकार ने उन्हें 2005 में शेवेलियर डे ला लेगियोन डी'होनूर (Chevalier de la Légion d'honneur) से सम्मानित किया। टाइम पत्रिका ने 2003 में उन्हें एशिया का हीरो और दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया। साल 2013 में जापान ने उन्हें अपने राष्ट्रीय सम्मान 'ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन- गोल्ड एंड सिल्वर स्टार' (Order of the Rising Sun- Gold and Silver Star) से सम्मानित किया।
साल 2011 में दिल्ली मेट्रो में मंगू सिंह को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था। लेकिन ई. श्रीधरन ने जो काम करने का तरीका और जो उच्च मानक स्थापित किए थे, वे आज भी भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनकी ईमानदारी, अनुशासन और समयबद्धता आज भी कई लोगों के लिए एक मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि अगर इरादा नेक हो और काम करने का जज्बा हो, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।