नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर को, जानें पश्चिम बंगाल के प्रमुख शक्ति पीठों के बारे में
नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर को, जानें पश्चिम बंगाल के प्रमुख शक्ति पीठों के बारे में
NewsPoint•
कोलकाता में धूमधाम से नवरात्र का स्वागत किया जा रहा है। इस बार नवरात्र का पर्व 11 अक्टूबर से शुरू होगा और 19 अक्टूबर को समाप्त होगा। इस दौरान भक्त देवी का पूजा-अर्चन करते हैं। खासकर पश्चिम बंगाल में कई शक्तिपीठ हैं, जहाँ भक्तों की भारी संख्या माता के दर्शन करने आती है। विभिन्न शक्तिपीठों की महत्त्वता और उनके पीछे की मान्यताएँ इस पर्व की रौनक को और बढ़ा देती हैं।
पूर्व मेदिनीपुर जिले के तामलुक में देवी कपालिनी का मंदिर है। यहाँ देवी सती की बायीं एड़ी गिरी थी। भक्त इसे भीमरूपा के रूप में पूजा करते हैं। यहाँ भगवान शिव ‘सर्वानंद’ रूप में विराजमान हैं। ‘कपालिनी’ का अर्थ होता है मुंड, यानी वह देवी जो खप्पर धारण करती हैं। इस शक्तिपीठ की उपासना से भक्त साहस और शक्ति प्राप्त करते हैं, साथ ही सभी प्रकार के भय और संकट से मुक्ति पाते हैं। अब चलते हैं हुगली जिले की ओर, जहाँ रत्नावली शक्तिपीठ है। यहाँ देवी कुमारी का मंदिर स्थित है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर देवी सती के दाएं कंधे के गिरने की जगह पर बना है। यहाँ माँ को ‘कुमारी’ या ‘आनंदमयी’ नाम से पूजा जाता है और भगवान शिव भैरव के रूप में विराजमान हैं। भक्त यहाँ आकर शांति एवं सुख की कामना करते हैं।
मुर्शीदाबाद जिले के किरीटकोण गाँव में किरीटेश्वरी शक्तिपीठ है। यहाँ देवी विमला देवी का मंदिर है, जहाँ देवी सती का मुकुट गिरा था। यहाँ देवी की उपासना विमला देवी के रूप में होती है। साथ ही, भगवान शिव का संकर्ता या काल भैरव रूप जुड़ा हुआ है। विमला देवी का बीज मंत्र है ‘ॐ ह्रीं विमलायै नमः’।
जलपाईगुड़ी जिले के बोडा मंडल में सालबाढ़ी गाँव में मां भ्रामरी देवी का मंदिर है। यहाँ देवी सती का बायां पैर गिरा था और यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक है। भ्रामरी देवी और भैरव ‘ईश्वर’ के रूप में यहाँ पूजा होती है। तीस्ता नदी के घने जंगलों के बीच स्थित इस अद्भुत मंदिर की शांति भक्तों को आकर्षित करती है। माँ भ्रामरी को कालिका या भद्रकाली का उग्र और करुणामय स्वरूप माना जाता है, जो काले रंग की मधुमक्खियों से घिरी रहती हैं।
वर्धमान जिले के केतुग्राम के बहुला देवी शक्तिपीठ में देवी सती का बायां हाथ गिरा था। यहाँ मां बहुला के रूप में पूजा होती है और भगवान शिव का भीरुक रूप पूजा जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर में सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उन्हें असीम शांति एवं समृद्धि मिलती है।
वर्धमान जिले के उजानी गाँव में मंगल चंद्रिका माता का शक्तिपीठ है, यहाँ देवी सती का दाहिना कलाई गिरा था। यहाँ माँ दुर्गा के स्वरूप देवी ‘मंगल चंडी’ की पूजा होती है। भक्तों का मानना है कि देवी की आराधना से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में पापहर नदी के किनारे स्थित वक्रेश्वर शक्तिपीठ में देवी सती का भ्रूमध्य गिरा था। यहाँ देवी को ‘महिषासुरमर्दिनी’ और भगवान शिव को ‘वक्रनाथ’ के रूप में पूजा करते हैं। बीरभूम के नलहाटी में नलहाटी शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती का कंठ गिरा था। यहाँ देवी ‘कालिका’ और भैरव की ‘योगीश’ रूप में पूजा की जाती है।
बीरभूम जिले के लाभपुर के पास फुल्लारा देवी शक्तिपीठ को अट्टहास शक्तिपीठ भी कहते हैं। यहाँ देवी सती का निचला होठ गिरा था और यहाँ माता को ‘फुल्लरा’ तथा भगवान शिव को ‘विश्वेश’ के रूप में पूजा जाता है। यहाँ एक विशाल प्राकृतिक शिला की पूजा की जाती है, जिसे माता का स्वरूप माना जाता है।
वीरभूम जिले के सैंथिया शहर में स्थित नंदीपुर शक्तिपीठ में देवी सती का कंठहार गिरा था। यहाँ माँ को ‘नंदिनी’ और भगवान शिव को ‘नंदिकेश्वर’ के रूप में पूजा होती है। माँ की मूर्ति एक बड़े वटवृक्ष के नीचे चांदी के मुकुट के साथ सुशोभित है।
वर्धमान जिले के क्षीरग्राम में युगाधा शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती का दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ की देवी ‘युगाद्या’ हैं और भगवान शिव को ‘क्षीर कंठक’ के नाम से पूजा जाता है।
कोलकाता में कालीघाट शक्तिपीठ एक प्रमुख और प्रसिद्ध धाम है। यहाँ देवी सती का दाहिना पैर का अंगूठा गिरा था। मां को ‘कालिका’ और भैरव को ‘नकुशील’ रूप में पूजा जाता है। इस स्थान की देवी की अद्वितीय प्रतिमा है, जिसमें तीन विशाल आंखें और चार हाथ हैं। यह स्थान आम श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि तांत्रिक साधना की दृष्टि से बहुत शक्तिशाली माना जाता है।
बीरभूम जिले में बोलपुर के पास कांची देवगर्भ शक्तिपीठ (कंकालिता मंदिर) 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ देवी की कमर गिर गई थी और माँ को ‘देवगर्भा’ के रूप में पूजा जाता है। इस शक्तिपीठ की पहचान तंत्र-मंत्र और साधना के लिए भी होती है, जबकि यहाँ श्मशान घाट के पास कई साधकों ने सिद्धि प्राप्त की है।
इन सभी शक्तिपीठों की महत्वपूर्णता नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं के लिए और बढ़ जाती है। यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का विशेष आयोजन है। भक्त यहां देवी की कृपा पाने और जीवन में सुख-शांति की कामना के साथ पहुँचते हैं। इस नवरात्र, श्रद्धालुओं का हृदय से स्वागत है, जब वे देवी माँ के चरणों में अपनी मान्यताएँ, प्रार्थनाएँ और आशाएँ लेकर आते हैं। सभी को नवरात्र की शुभकामनाएँ!