Supreme Court ने दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए समिति गठित करने का किया आदेश
Supreme Court ने दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए समिति गठित करने का किया आदेश
NewsPoint•
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक समिति गठित करे। इस समिति में डॉक्टरों को उपहार, आतिथ्य और अन्य लाभ देने से जुड़े अनैतिक प्रथाओं की जांच की जाएगी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच अनैतिक संपर्क पर रोक लगाने की एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।
सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केंद्र सरकार तीन सदस्यीय समिति का गठन करेगी। यह समिति यह जांच करेगी कि क्या दवा कंपनियों को नियंत्रण में लाने के लिए कोई कानूनी ढाँचा चाहिए या नहीं। यदि जरूरत पाई जाती है, तो समिति यह भी सुझाव देगी कि ऐसा नियमन किस तरह से किया जाना चाहिए। मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत डॉक्टरों के लिए दवा कंपनियों से लाभ लेना निषिद्ध है, लेकिन दवा कंपनियों की गतिविधियों पर कोई समान कानूनी मानदंड नहीं है।याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मौजूदा कानून में असमानता है। डॉक्टरों को प्रलोभन देने वाले दवा कंपनियों पर कोई समान कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह समिति के गठन और उसके सुझावों पर एक हलफनामा दाखिल करे। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।
यह मामला दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को अपने उत्पादों के प्रचार के लिए दिए जाने वाले उपहारों और अन्य लाभों की चिंताओं से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने दवा कंपनियों के इस तरीके को लेकर चिंता जताई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह प्रथा चिकित्सा क्षेत्र में नैतिकता का उल्लंघन करती है, जिससे मरीजों को नुकसान हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दवा कीमतों के मामले में भी केंद्र सरकार से सवाल किया है। अदालत ने एक कैंसर की दवा का उदाहरण देते हुए पूछा कि जिस दवा की अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) 27,000 रुपये है, वह खुदरा विक्रेताओं को 2700 से 3000 रुपये में क्यों बेची जा रही है। कोर्ट ने इसे "दिनदहाड़े डकैती" जैसे शब्दों में व्यक्त किया है।
जस्टिस नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत आने वाले फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए समान लाभ मार्जिन निर्धारित किया जा सकता है, चाहे दवाएं आवश्यक या गैर-आवश्यक श्रेणी में हों। कोर्ट ने कहा कि एमआरपी और दवा की आपूर्ति कीमत के बीच का यह बड़ा अंतर मरीजों के भरोसे को नुकसान पहुँचा सकता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर एक दवा जिसकी एमआरपी 27,000 रुपये है, 3000 रुपये में बेची जा रही है, तो मरीज को यह संदेह हो सकता है कि यह दवा नकली है। ऐसा होना मरीजों की जान के लिए भी खतरा साबित हो सकता है।
इस स्थिति ने दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच के रिश्तों को भी संदिग्ध बना दिया है। दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को दिए जाने वाले उपहारों और प्रलोभनों को लेकर व्यापक चिंताओं ने महामारी के दौरान बढ़ती समस्याओं की ओर इशारा किया है। इससे डॉक्टर्स की सच्चाई और दवा की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं।
कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कई परिभाषाएं बदल दी हैं। अब मरीजों को सच्ची और पारदर्शी जानकारी की आवश्यकता है। इसलिए यह समिति दवा कंपनियों की गतिविधियों की पारदर्शिता को बढ़ाने और उनके खिलाफ कानूनी प्रावधानों को मजबूत करने की दिशा में भी काम करेगी।
फिलहाल, यही उम्मीद की जा रही है कि केंद्र सरकार इस नई समिति के सुझावों के आधार पर दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए उचित कदम उठाएगी। इससे न केवल डॉक्टरों और दवा कंपनियों के रिश्तों में पारदर्शिता आएगी बल्कि मरीजों की देखभाल में भी सुधार होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम एक सकारात्मक दिशा में उठाया गया कदम है जो चिकित्सा क्षेत्र में नैतिकता और पारदर्शिता को बढ़ावा देगा। अब देखना यह है कि इस दिशा में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और यह समिति किस प्रकार की सिफारिशें करती है।