इसरो ने निजीकरण की खबरों का खंडन किया, कहा- अंतरिक्ष कार्यक्रम का केंद्रीय संस्थान बना रहेगा

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Navbharat Times
नई दिल्ली, 6 सितंबर: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने हाल ही में आई उन मीडिया रिपोर्टों को पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद बताया है जिनमें कहा गया था कि इसरो का निजीकरण किया जाएगा या उसकी भूमिका कम कर दी जाएगी। इसरो ने साफ किया है कि वह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का मुख्य संस्थान बना रहेगा और भविष्य के सभी बड़े मिशनों की कमान संभालेगा। इसरो ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विस्तृत बयान जारी कर इन अटकलों को खारिज किया।

इसरो ने अपने बयान में कहा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह खबरें फैलाई जा रही थीं कि अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों के बाद इसरो का निजीकरण हो जाएगा या उसकी अहमियत घट जाएगी। संगठन ने इन दावों को सिरे से नकारते हुए कहा कि इसरो का न तो निजीकरण होगा और न ही उसकी भूमिका सीमित की जाएगी। इसरो देश में उन्नत अंतरिक्ष अनुसंधान, राष्ट्रीय और रणनीतिक मिशनों, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी की लॉन्च तकनीकों, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, चंद्र और ग्रहों की खोज जैसे महत्वपूर्ण मिशनों का नेतृत्व करता रहेगा।
संगठन के अनुसार, निजी क्षेत्र की भागीदारी का मकसद इसरो की भूमिका को कम करना नहीं है, बल्कि इसरो को और अधिक उन्नत अनुसंधान और भविष्य की तकनीकों पर ध्यान केंद्रित करने का मौका देना है। इसरो ने बताया कि वर्ष 2020 से शुरू किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधार और भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 का मुख्य उद्देश्य भारत में एक मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी स्पेस इकोसिस्टम (अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र) तैयार करना है।

इसरो ने स्पष्ट किया कि उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों को अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन (मूल्य श्रृंखला) में भाग लेने का अवसर दिया जा रहा है। इससे इसरो की क्षमताएं और मजबूत होंगी। इसलिए, इन सुधारों को निजीकरण के रूप में नहीं, बल्कि स्पेस इकोसिस्टम के विस्तार के तौर पर देखा जाना चाहिए।

इसरो ने यह भी बताया कि उसने अपनी कई परिपक्व तकनीकों को उद्योगों को हस्तांतरित कर दिया है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इसरो उस क्षेत्र से हट रहा है। बल्कि, इससे बड़े पैमाने पर उत्पादन, व्यावसायीकरण और वैश्विक बाजार तक पहुंच आसान होगी। वहीं, इसरो के वैज्ञानिक अगली पीढ़ी की तकनीकों और जटिल राष्ट्रीय मिशनों पर काम कर सकेंगे।

भारत के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इसरो का उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान और रणनीतिक क्षमताओं पर केंद्रित रहना बहुत जरूरी है। इसरो ने बताया कि 2020 में भारत में केवल कुछ ही स्पेस स्टार्टअप थे, जबकि आज उनकी संख्या 450 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप लॉन्च व्हीकल (लॉन्च करने वाले वाहन), सैटेलाइट (उपग्रह), प्रोपल्शन (ईंधन प्रणाली), अर्थ ऑब्जर्वेशन (पृथ्वी अवलोकन), कम्युनिकेशन (संचार) और स्पेस एप्लिकेशन (अंतरिक्ष अनुप्रयोग) जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

इसरो के अनुसार, भारत की स्पेस इकोनॉमी (अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था) फिलहाल करीब 8.4 अरब डॉलर की है और 2033 तक इसे बढ़ाकर 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी संसाधनों के साथ-साथ निजी निवेश, औद्योगिक क्षमता और उद्यमिता की भी आवश्यकता होगी।

इसरो ने अपने बयान में कहा कि भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना है। इसके अलावा, 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजना, पुन: प्रयोज्य लॉन्च सिस्टम (बार-बार इस्तेमाल होने वाले लॉन्च सिस्टम) विकसित करना और चंद्रमा व अन्य ग्रहों की दीर्घकालिक खोज को आगे बढ़ाना भी शामिल है।

संगठन ने जोर देकर कहा कि ऐसे बड़े और महत्वाकांक्षी मिशनों के लिए इसरो का उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान और रणनीतिक क्षमताओं पर केंद्रित रहना बेहद आवश्यक है। इसरो ने यह भी बताया कि उसने अपनी कई पुरानी और विकसित तकनीकों को उद्योगों को हस्तांतरित कर दिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि इसरो उन क्षेत्रों से पीछे हट रहा है। बल्कि, इससे बड़े पैमाने पर उत्पादन, उत्पादों को बाजार में लाना और दुनिया भर में बेचना आसान हो जाएगा। वहीं, इसरो के वैज्ञानिक नई पीढ़ी की तकनीकों और देश के लिए जरूरी जटिल मिशनों पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाएंगे।

इसरो ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी क्षेत्र की भागीदारी का उद्देश्य इसरो की भूमिका को कम करना नहीं है। बल्कि, यह इसरो को और अधिक उन्नत अनुसंधान और भविष्य की तकनीकों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर प्रदान करेगा। इसरो ने कहा कि वर्ष 2020 से शुरू किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधार और भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 का मुख्य उद्देश्य भारत में एक बड़ा, मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी स्पेस इकोसिस्टम (अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र) तैयार करना है।

बयान में कहा गया कि उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों को अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन (मूल्य श्रृंखला) में भागीदारी का अवसर दिया जा रहा है, जिससे इसरो की क्षमताएं और मजबूत होंगी। इसलिए इन सुधारों को निजीकरण नहीं, बल्कि स्पेस इकोसिस्टम के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए। इसरो ने बताया कि भारत की स्पेस इकोनॉमी (अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था) फिलहाल करीब 8.4 अरब डॉलर की है और 2033 तक इसे बढ़ाकर 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सरकारी संसाधनों के साथ-साथ निजी निवेश, औद्योगिक क्षमता और उद्यमिता की भी जरूरत होगी।