संयुक्त राष्ट्र महासभा में G20 देशों के नेताओं की भाषणों से उभरी वैश्विक चिंता, युद्ध और आर्थिक संकट पर चर्चा
संयुक्त राष्ट्र महासभा में G20 देशों के नेताओं की भाषणों से उभरी वैश्विक चिंता, युद्ध और आर्थिक संकट पर चर्चा
NewsPoint•
संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं ने साझा चिंता व्यक्त की कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर हो रही है। 28 सितंबर को हुई इस बहस में पांच दिनों के दौरान जी20 के 19 सदस्य देशों ने वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। इसमें युद्धों, आर्थिक दबाव, टूटती सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर घटते भरोसे जैसे मुद्दे शामिल थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का बचाव किया और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की आलोचना की। वहीं, चीन ने विवादों के समाधान के लिए बातचीत पर जोर दिया, जबकि भारत ने चेतावनी दी कि वैश्विक संघर्षों की आर्थिक कीमत सभी देशों को चुकानी पड़ रही है।
इन सबके बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र को ऐसे वैश्विक नौकरशाहों के बेहद वामपंथी एजेंडे को थोपना बंद करना चाहिए, जिन्हें कभी किसी ने चुना ही नहीं।" ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई और अपनी नीतियों का समर्थन करते हुए अमेरिका की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। ट्रंप का यह बयान इस बात पर जोर देता है कि अमेरिका वैश्विक मुद्दों पर अपनी स्थिति को मजबूती से बनाए रखना चाहता है।चीन की ओर से उप राष्ट्रपति हान झेंग ने इसके विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, “दुनिया शांति चाहती है, युद्ध नहीं।" उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा करने पर जोर दिया और बातचीत के माध्यम से विवादों के समाधान की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने संरक्षणवाद की नीतियों का विरोध करते हुए कहा कि इससे किसी की जीत नहीं होती है।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस बहस में एक नई शक्ति केंद्र की उभरती वैश्विक south एवं east की आवश्यकता की बात की। उन्होंने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया कि वे अपने सदियों से बने दबदबे और विशेष अधिकारों को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। यह बातें उन देशों की चिंताओं को उजागर करती हैं, जो वैश्विक संतुलन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
फ्रांस, जर्मनी, इटली और ब्रिटेन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करते हुए कहा कि वैश्विक संस्थानों को समय के साथ अद्यतन किया जाना चाहिए। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सवाल उठाया, “क्या दुनिया जंगल के कानून की ओर लौटना चाहती है या एक सभ्य अंतरराष्ट्रीय समाज चाहती है?" जर्मनी के विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र को संघर्षों का समाधान करने वाले संस्थान के रूप में देखने की जरूरत बताई।
भारत ने महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि "जो देश सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, अक्सर फैसले लेने में उनकी आवाज सबसे कम होती है।" उन्होंने खाद, ईंधन, व्यापार और वित्त की सप्लाई में रुकावटों का जिक्र किया। भारत ने इससे आगे बढ़ते हुए युद्धों के कारण उत्पन्न संकटों के बारे में चेतावनी दी।
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में निर्णय न हो पाने से जुड़ी विश्वसनीयता की चिंताओं को उठाया। उन्होंने कहा, "हम सभी जानते हैं कि युद्ध के मैदान में कोई विजेता नहीं होगा। कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है।"
इसी तरह, मेक्सिको के विदेश मंत्री रॉबर्टो वेलास्को अल्वारेज ने शांति के लिए सामाजिक न्याय की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "शांति का सिर्फ आदेश नहीं दिया जा सकता और न ही इसे किसी पर थोपा जा सकता है।" यह साफ है कि विभिन्न देश शांति कायम रखने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण अपना रहे हैं।
अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई ने तो साफ कहा कि "संयुक्त राष्ट्र एक बेकार संगठन है" और इसे एक नौकरशाही के रूप में आरोपित किया। यह उनके विचारों को स्पष्ट करता है कि वे कैसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को भी सीमित मानते हैं।
आस्ट्रेलिया, कनाडा, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में संतुलन बनाए रखने के महत्व को रेखांकित किया। आस्ट्रेलिया के पीएम एंथनी अल्बानीज ने कहा कि "संयुक्त राष्ट्र के मिशन और उसकी जिम्मेदारियों को सिर्फ बड़ी शक्तियों, अमीर देशों या टेक्नोलॉजी कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।" उन्होंने मध्यम आकार की शक्तियों को तनाव कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण बल के रूप में पेश किया।
कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने मौजूदा वैश्विक हालात को अपेक्षाकृत चिंताजनक बताया और कहा कि "अब देशों के लिए किसी एक साझेदार पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहना ठीक नहीं है।" वहीं, इंडोनेशिया ने सहकारी संरचनाओं की आवश्यकता को बल दिया।
दक्षिण अफ्रीका ने वैश्विक आर्थिक असमानता को मुद्दा बनाया। उसने कहा कि "दुनिया के सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का करीब तीन-चौथाई हिस्सा है।" इस बात ने वैश्विक व्यापार में समता और विकास की अत्यावश्यक जरूरत को उठाया।
तुर्किये ने विभिन्न देशों पर अंतरराष्ट्रीय कानून को लागू करने में असमानता की बात की। यह बयान अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय में नियमों के सही अनुप्रयोग की आवश्यकता को दिखाता है।
आखिरकार, जी20 की बैठक का यह संकेत साफ है कि युद्ध आर्थिक संकट को बढ़ा रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं। हालांकि, इनके समाधान की दिशा में विभिन्न देशों की सोच में भिन्नता देखी गई। कुछ देशों ने बहुपरक संस्थाओं के पुनर्निर्माण की बात की, जबकि अन्य ने राष्ट्रीय नियंत्रण और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी।
ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किस प्रकार ये देश अपनी चिंताओं को एक साथ मिलकर सुलझाते हैं और वैश्विक स्तर पर कैसे सहयोग बढ़ाते हैं।