Supreme Court Seeks Response From Center On Rti Transparency In Data Protection Law Petition
सुप्रीम कोर्ट में डेटा संरक्षण कानून पर RTI की पारदर्शिता को लेकर याचिका, केंद्र से मांगा जवाब
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सुप्रीम कोर्ट ने डेटा संरक्षण कानून पर आरटीआई की पारदर्शिता को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। यह याचिका डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के उन प्रावधानों को चुनौती देती है जो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पारदर्शिता को कमजोर करते हैं। अदालत ने राजस्थान को भी इस मामले में पक्षकार बनाया है।
नई दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा)। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक जनहित याचिका ( PIL ) पर जवाब मांगा है। यह याचिका डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 ( DPDP Act ) के उन प्रावधानों को चुनौती देती है, जिनके बारे में याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे 2005 के सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत पारदर्शिता को कमजोर करते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग) और कानून और न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। पीठ ने राजस्थान को भी इस मामले में एक पक्ष बनाने का निर्देश दिया है।
यह जनहित याचिका 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' के साथ-साथ कार्यकर्ताओं अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह रावत ने दायर की है। याचिका में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) को चुनौती दी गई है। यह धारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) का स्थान लेती है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया है कि वे धारा 44(3) को असंवैधानिक और शून्य घोषित करें, क्योंकि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 का उल्लंघन करती है।याचिका में प्रमुख राहतों में से एक यह है कि अदालत सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की मूल धारा 8(1)(j) को, उसके परंतुक (proviso) सहित, 13 नवंबर, 2025 से पूर्वव्यापी प्रभाव से बहाल करे। याचिकाकर्ताओं ने यह भी घोषणा करने की मांग की है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 के तहत सक्रिय प्रकटीकरण (proactive disclosure) का जनादेश, जिसने लाभार्थियों के डेटा, हाजिरी रजिस्टर (muster rolls), सामाजिक ऑडिट रिकॉर्ड और नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले समान रिकॉर्ड के प्रकटीकरण को सक्षम बनाया था, वह DPDP Act के लागू होने से अप्रभावित रहेगा। साथ ही, राज्य संवैधानिक रूप से इस सक्रिय प्रकटीकरण ढांचे को बनाए रखने और संचालित करने के लिए बाध्य है।
इसके अलावा, याचिका में अधिकारियों को पारदर्शिता और जवाबदेही पोर्टलों के माध्यम से वर्तमान में प्रदान की जा रही सूचना तक पहुंच को "नष्ट करने, प्रतिबंधित करने या कम करने" से रोकने के निर्देश देने की मांग की गई है। इसमें राजस्थान के जन सूचना पोर्टल (Jan Soochna Portal) और सूचना का अधिकार अधिनियम या किसी अन्य कल्याणकारी कानून के तहत दायित्वों के अनुसार स्थापित सभी समान पोर्टलों का उल्लेख किया गया है।
यह मामला सूचना के अधिकार के भविष्य और नागरिकों की जानकारी तक पहुंच के अधिकार से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि DPDP Act के नए प्रावधान RTI Act की मूल भावना को कमजोर कर रहे हैं, जो सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। विशेष रूप से, धारा 8(1)(j) में बदलाव से व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर प्रतिबंध लग सकता है, जिसका असर उन सूचनाओं पर पड़ सकता है जो सीधे तौर पर नागरिकों के कल्याण और अधिकारों से जुड़ी हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि यह डेटा संरक्षण और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस मामले में क्या फैसला सुनाती है और यह भविष्य में पारदर्शिता के मानकों को कैसे प्रभावित करता है। राजस्थान को पक्षकार बनाने का मतलब है कि राज्य के जन सूचना पोर्टल जैसे पहलों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह मामला देश भर में सूचना के अधिकार के उपयोग और उसके भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।