NBT रिपोर्ट, नई दिल्ली: अपने सफर को आसान और आरामदायक बनाने के लिए आप जिन गाड़ियों पर खर्च कर रहे हैं क्या वही गाड़ियां आपको कैंसर की बीमरी दे रही हैं? क्या आपकी एसी गाड़ियों के अंदर की हवा में कैंसर देने वाल केमिकल का इस्तेमाल हो रहा है और यह सांसों के जरिए आपके शरीर में जा रहे हैं? एनजीटी के आदेश के बाद इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने इस पर जांच आगे बढ़ा दी है।
आईसीएमआर के डिप्टी डायरेक्टर जनरल (एडमिन) जगदीश राजेश की तरफ से अब हुई जांच की रिपोर्ट एनजीटी में सबमिट की गई है। रिपोर्ट पूरी होने में अभी डेढ़ साल लगने की बात कही गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जांच के लिए स्टाफ की रिक्युटमेंट की गई है। रिसर्च का मकसद यह पता लगाना है कि गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले केमिकल (फ्लेम रिटार्डेट्स) ड्राइवरों की सेहत पर कितना असर डालते हैं। इस प्रोजक्ट में अलग अलग तरह की कार चलाने वाले लोगों (एसयूपी, सेडान और हैचबैक) को शामिल किया जा रहा है। हर इलाके (जैसे गर्म, ठंडे और अन्य मौसम वाले क्षेत्र) से करीब 60 लोगों को चुना जा रहा है। इन ड्राइवरों की उम्र 23 से 50 साल के बीच होगी और उन्हें कम से कम 5 साल का ड्राइविंग अनुभव होना जरूरी है। वैज्ञानिक लोगों के ब्लड और यूरीन सैंपल लेकर यह जांच करेंगे कि उनके शरीर में ये केमिकल कितनी मात्रा में मौजूद हैं। ड्राइवरों के सैंपल ड्यूटी शुरू होने से पहले और खत्म होने के बाद लिए जाएंगे। इससे फर्क को आसानी से समझा जा सकेगा। कुछ ऐसे लोगों को भी शामिल किया जाएगा जो ज्यादा कार में सफर नहीं करते। वैज्ञानिकों ने अहमदाबाद और गांधीनगर में जाकर लोगों से बातचीत भी शुरू कर दी है। ब्लड सैंपल की जांच की तकनीक तैयार हो चुकी है। यूरीन सैंपल की जांच पर काम जारी है। आजकल कारों में प्लास्टिक और फोम जैसे मटेरियल ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। इनमें इस तरह के केमिकल मौजूद होते हैं। गर्मी में कार के अंदर तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है, जिससे ये केमिकल हवा में मिल जाते हैं और ड्राइवर इन्हें सांस के जरिए शरीर में ले सकते हैं।




