दीवार पर सीलन

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हिंदी में 'सील' और 'शील' शब्दों के अर्थ भिन्न हैं। 'सील' नमी और गीलेपन से जुड़ा है, जैसे दीवारों की सीलन। वहीं 'शील' आचरण, चरित्र, विनम्रता और नैतिकता को दर्शाता है। बौद्ध दर्शन में 'शील' को साधना का आधार माना गया है। क्षमाशील, दयाशील जैसे शब्द व्यक्तित्व की दिशा बताते हैं। शील ही मनुष्य का सच्चा आभूषण है।

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हिंदी में ‘सील’ और ‘शील’ देखने में भले एक जैसे लगते हों, पर अर्थ और भाव की दृष्टि से दोनों बिल्कुल अलग हैं। उच्चारण का सूक्ष्म अंतर ‘सी’ और ‘शी’ कई बार बोलचाल में धुंधला पड़ जाता है, और अर्थ बदल जाता है। ‘सील’ का संबंध नमी और गीलेपन से है। जब दीवारों, कपड़ों या जमीन में भीतर से नमी आ जाती है, तो उसे सीलन कहते हैं। सिलबट्टा में भी ‘सील’ पत्थर की ठोस पटिया को दर्शाता है, जिस पर मसाले पीसे जाते हैं। वहीं संस्कृत का ‘शील’ शब्द आचरण के पीछे के स्थायी स्वभाव को व्यक्त करता है। यह व्यक्ति के चरित्र, विनम्रता और नैतिकता को बताता है। हम दूसरों से कैसे बोलते हैं, कैसे व्यवहार करते हैं, ये सब हमारे शील को दर्शाते हैं। बौद्ध दर्शन में ‘शील’ को साधना का आधार माना गया है। पंचशील इसी नैतिक अनुशासन की रूपरेखा है, जो व्यक्ति को भीतर से परिष्कृत और पवित्र बनाता है। ‘शील’ से बने शब्द- क्षमाशील, दयाशील, प्रज्ञाशील, कर्मशील केवल गुण नहीं, व्यक्तित्व की दिशा बताते हैं। इसलिए कहा गया है- शील ही मनुष्य का सच्चा आभूषण है।