NBT रिपोर्ट: हेल्थ बीमा और सरकारी योजनाओं का दायरा 2017-18 से 2025 के बीच काफी बढ़ गया है, लेकिन अस्पताल में भर्ती होने का खर्च आज भी आम आदमी को अपनी जेब से ही भरना पड़ रहा है। नैशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच किए गए ताजा सर्वे में यह जानकारी सामने आई है। 2017-18 के सर्वे में पता चला था कि अस्पताल के 90% से ज्यादा खर्च का बोझ मरीज खुद उठाता था। उस वक्त गांवों में 13% और शहरों में 9% लोगों के पास ही सरकारी बीमा योजना कवर था।
क्या है स्थिति? : ताजा सर्वे के मुताबिक, अब गांवों में करीब 46% और शहरों में 32% लोगों के पास बीमा कवर है। इसके बावजूद, इलाज का बड़ा हिस्सा आज भी जेब से ही जा रहा है। गांवों में अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 31,500 रुपये खर्च हो रहे हैं, जो कुल खर्च का करीब 95% है। वहीं शहरों में भर्ती होने का औसत खर्च लगभग 47,000 रुपये है, जिसमें से मरीज को अपनी जेब से करीब 39,000 रुपये (कुल खर्च का 83%) देने पड़ रहे हैं।
बच्चे के जन्म पर खर्च? : TOI के मुताबिक, बच्चे के जन्म यानी डिलिवरी पर होने वाला लगभग पूरा खर्च मरीज के परिवार को खुद ही उठाना पड़ रहा है। हालांकि, शहरों में डिलिवरी और इलाज के कुल खर्च के मुकाबले जेब से होने वाला खर्च थोड़ा कम है।
कितनी बढ़ोतरी? : 2017-18 और 2025 के बीच अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च करीब दोगुना हो गया है। शहरों के मुकाबले गांवों में महंगाई ज्यादा बढ़ी है। गांवों में इलाज का खर्च 97% बढ़ा, जबकि शहरों में यह बढ़ोतरी 77% रही। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि सरकारी अस्पतालों की तुलना में प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होने का खर्च बहुत ज्यादा बढ़ा है।
भर्ती होने की स्थिति? : एक दिलचस्प बात यह भी है कि अस्पताल में भर्ती होने की दर (प्रति 1,000 व्यक्ति) पिछले सर्वे की तरह इस बार भी 29 ही रही है। हालांकि, गांवों में यह दर 26 से बढ़कर 29 हो गई है, जबकि शहरों में यह 34 से घटकर 32 पर आ गई है।



