n दीपाली श्रीवास्तव, गुड़गांव
वो बोलता नहीं, बस अपने में रहता है…। किसी से मिलता नहीं...हमने सोचा शर्मीला है, लेकिन मामला कुछ और निकला। यह कहना है सेक्टर-40 की गार्गी (बदला हुआ नाम) का। पांच साल के बेटे की मां गार्गी बताती हैं कि डॉक्टरों ने बेटे में ऑटिज्म के लक्षण बताए तो समय रहते थेरपी शुरू हो पाई। अब बच्चे में सुधार हो रहा है। ऐसा ही केस सेक्टर-56 की नेहा (बदला हुआ नाम) का भी है। उनका बेटा ढाई साल की उम्र तक न बोलता था और न ही आंखों में आंखें डालकर बात करता था। परिवारवाले कहते थे लड़के देर से बोलते हैं, लेकिन दिल में डर था। ऐसे में डॉक्टर को दिखाया तो ऑटिज्म के बारे में पता चला। हालांकि अब नियमित स्पीच और बिहेवियर थेरपी के बाद बच्चे में काफी सुधार दिख रहा है।
बड़े शहरों में ऐसे मामले अब बढ़ने लगे हैं। मिलेनियम सिटी में बच्चों की चुप्पी अब सिर्फ शर्मीलापन नहीं मानी जा सकती। शहर के अस्पतालों की मेंटल हेल्थ ओपीडी में आने वाले हर पांच में से एक बच्चे में ऑटिज्म के लक्षण पाए जा रहे हैं। वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे के मौके पर सामने आए आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि माता-पिता को बच्चों के व्यवहार को लेकर अब ज्यादा सतर्क होने की जरूरत है।
बीमारी नहीं है, लेकिन ध्यान देना ज़रूरी
साइकाइट्रिस्ट डॉ.अजय का कहना है कि माता-पिता अक्सर ऑटिज्म के शुरुआती संकेतों को शर्मीला स्वभाव या देर से बोलना समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसा नहीं करना है। ऐसे मामलों को जल्दी पकड़ना जरूरी है। बच्चा नाम पुकारने पर रिस्पॉन्स नहीं देता, आंखों से संपर्क नहीं करता, या बोलने में देरी हो रही है तो इसे सामान्य समझकर टालना खतरनाक हो सकता है। 2-3 साल की उम्र में स्क्रीनिंग जरूरी है, जिससे उसका जल्द से जल्द थेरपी देकर एक सामान्य जीवन दिया जा सके। ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि न्यूरो-डिवेलपमेंट कंडीशन है। सही समय पर पहचान और थेरपी से बच्चे बेहतर जीवन जी सकते हैं।


