n दीपाली श्रीवास्तव, गुड़गांव
हाथों का कंपन, चाल में धीमापन और शरीर में जकड़न को सिर्फ बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें। यह न्यूरोलॉजिकल बीमारी पार्किंसन भी हो सकती है। हालांकि बीते कुछ समय से शहर में इस बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है, इसका असर यह है कि दो से तीन साल में मामले 50 फीसदी तक बढ़े हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह बढ़ोतरी केवल बीमारी के प्रसार का संकेत नहीं बल्कि बेहतर डायग्नोसिस और बढ़ती जागरूकता का परिणाम है। लोग अब शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेते हुए समय रहते डॉक्टरों तक पहुंच रहे हैं। शहर के कुछ निजी अस्पतालों के आंकड़े इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। आर्टेमिस अस्पताल में एक साल में ही 300 से 400 नए मामले आए हैं। वहीं, मैक्स हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी क्लिनिक में आने वाले करीब 6 फीसदी मरीज मूवमेंट डिसऑर्डर से ग्रस्त होते हैं, इनमें 30 से 35 प्रतिशत में पार्किंसन की पुष्टि होती है। मैक्स हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. सिद्धार्थ धर के मुताबिक, पार्किंसन के ज्यादातर मामले इडियोपैथिक होते हैं, यानी इनके पीछे कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आता। हालांकि 5 से 10 फीसदी मामलों में स्ट्रोक, दवाइयों के साइड इफेक्ट, संक्रमण या जहरीले तत्व जिम्मेदार हो सकते हैं। आर्टेमिस हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी एवं मूवमेंट डिसऑर्डर विशेषज्ञ डॉ. मोहित आनंद का कहना है कि पिछले कुछ साल में जो बढ़ोतरी दिख रही है, उसकी सबसे बड़ी वजह जागरूकता है।
प्रदूषण भी बढ़ा रहा बीमारी का जोखिम : फोर्टिस मानेसर के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. संकल्प मोहन के अनुसार यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और हर मरीज में इसकी गति अलग होती है। प्रदूषण, खासकर पीएम-10 जैसे कण भी जोखिम बढ़ा सकते हैं। अब पार्किंसन के इलाज में भी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा है। दवाइयों के साथ-साथ एडवांस क्लिनिकल असेसमेंट, फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी को अहम माना जा रहा है।


