क्रिकेट, प्रदूषण, चुनाव और रील अब डेली इंवेंट हैं, इसलिए तैयारी भी निरंतर होती है। सुखनंदन ने भी कार्यकर्ता संवाद रखा था। वह दूरदर्शी हैं, सियासी नब्ज समझते हैं। क्या पता कल को सांसद पति, विधायक पति की भूमिका निभानी पड़े, इसलिए बैठक में सुधर्मा को भी रहना था।
सुधर्मा गाड़ी में बैठते ही पूछ बैठीं, ‘यह कार्यकर्ता संवाद क्या है?’ सुखनंदन ने उलटकर पूछ लिया, ‘पांच साल सत्ता की मलाई काटने के बाद चुनाव के समय नेतृत्व सबसे पहले किसे याद करता है?’ ‘काम को।’ सुखनंदन मुस्कुराए, ‘नहीं प्रिये! कार्यकर्ता को, क्योंकि कार्यकर्ता वह बैल है जिसके कंधे पर हल रख नेता सत्ता की जमीन उर्वरा करता है। पीठ पर विचारधारा का डंडा और मुंह में जाबा अलग से होता है, जिससे वह बगल का खेत न चर सके। बस बीच-बीच में पीठ पर हाथ फेरते रहिए, दोगुनी ताकत के साथ वह जुआ कंधे पर रख लेता है।'
‘छुट्टा आकर खेत चर जाए तो?’ सुधर्मा ने फिर पूछा। ‘इसी के समाधान के लिए कार्यकर्ता संवाद होता है।’ सुखनंदन ने जवाब दिया। सवाल-जवाब के बीच दोनों बैठक स्थल पहुंच गए। गुलाब-गेंदे की लाल-पीली मालाओं से अधिक कार्यकर्ताओं की लाल आंखें, पीले चेहरे इंतजार में थे। सुधर्मा सहमीं, सुखनंदन आश्वस्त। बैठक में शिकायतों के अनगिनत तीर चले। एक ने कुत्ते से तुलना कर दी। यूं लगा सुखनंदन इसी का इंतजार कर रहे थे। हाथ जोड़ कर बोले, ‘कुत्ते दो तरह के होते हैं, एक पट्टाधारी और दूसरे बिना पट्टे के। पट्टाधारी यानी पालतू। बिना पट्टे का यानी घूमंतू। आप पालतू कुत्ते को रोटी देंगे तो वह आपके पैरों में बैठ सामने खाएगा। घुमंतू कुत्ता रोटी चुराएगा, नजर बचाकर खाएगा जिससे कोई देखे न। आप ने देख लिया तो आप पर भौंकेगा भी। आप ही तय कर लीजिए, किसे रोटी डालनी है?’ सभाकक्ष में सन्नाटा छा गया। सुखनंदन ने सब साध लिया था। तब तक सुधर्मा पूछ बैठीं, ‘कुर्सी पर कौन बैठेगा, पट्टाधारी या घुमंतू?’ सुखनंदन बैठक छोड़ चले गए।


