जब बड़े मियां से पंगा ले बैठे नवाब सआदत

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अवध के नवाब सआदत अली खान ने एक महफिल में शराब पीकर सूफी संत बड़े मियां का अपमान किया। उन्होंने अपनी चहेती तवायफ को संत की गोद में बैठने का इशारा किया। संत ने नवाब को उनके पिता और भाई का ख्याल रखते हुए छोड़ दिया। इस घटना से नवाब को शर्मिंदगी हुई।

nawab saadats alcoholism and confrontation with bade miyan a historical event in lucknow

अवध के छठे नवाब सआदत अली खान (1798-1814) के वक्त लखनऊ में सैयद ख्वाजा हुसैन चिश्ती नामक एक सूफी संत हुआ करते थे। जानकारों के अनुसार, 'बड़े मियां' नाम से प्रसिद्ध इन संत का विद्वत्ता में कोई सानी नहीं था। वह नवाब आसफ-उद-दौला के समय लखनऊ आए थे और रुस्तम नगर में अपने अजीज नवाब मोहब्बत खान बहादुर शहबाज जंग के घर पर रहते थे। सआदत के तख्तनशीन होने तक शहर में उनका ठिकाना अध्यात्म का केंद्र बन गया था, जहां आम लोगों के अलावा अनेक वजीर व कुलीन वर्ग के लोग भी आया-जाया करते। सआदत भी उनको कभी अपने दरबार तो कभी महफिलों में अदब व आदर के साथ बुलाते थे।

लेकिन, सआदत की शराब की लत ने इस सिलसिले को लंबा नहीं चलने दिया। निशातबाग स्थित बारादरी में एक चौदहवीं की रात सजी महफिल में वह अंगूरी (एक खास तरह की शराब) की पिनक में ऐसे बेखुद हुए कि बड़े मियां की शान में गुस्ताखी कर बैठे। ऐसी गुस्ताखी, जो बड़े मियां के लिहाज से किसी भी तरह काबिल-ए-माफी नहीं थी।

हुआ यह कि अंगूरी उनके सिर चढ़कर बोलने लगी तो उनको एक बेहूदा चुहल सूझी। वह मुजरा कर रही उजागर नामक अपनी चहेती तवायफ को बड़े मियां की गोद में जा बैठने का इशारा करने लगे। उजागर पायल छनकाती बड़े मियां की ओर बढ़ी तो उन्होंने उसको खुद से दूर ही रहने को कहा। बड़े मियां के अदब न खोने को उनकी कमजोरी समझ सआदत की चुहल और बेलगाम हो गई। उन्होंने उजागर को फिर उकसाया तो वह ढीठ होकर आगे बढ़ी। लेकिन, इस बार बड़े मियां उसे जलती आंखों से कुछ इस तरह घूरने लगे कि उसकी हिम्मत जवाब दे गई और वह पलटकर नाचने लगी। तभी उसने देखा कि सआदत की भृकुटियां तन गई हैं। उजागर ने खुद को दो पाटों के बीच फंसा महसूस किया और इससे निजात पाने के लिए बड़े मियां के पहलू तक जा पहुंची।

बड़े मियां उसे धकेल कर उठ खड़े हुए और सआदत पर बरसते हुए बोले, 'शुजाउद्दौला के बेटे, तेरी यह मजाल! तेरे बाप और भाई का ख्याल करके मैं तुझे छोड़ दे रहा हूं, वरना आज जानें क्या कर डालता! लेकिन तू करे भी तो क्या, शराब ने तेरी तहजीब से सौदा कर लिया है, वरना मेरी जिस गोद में बैठकर शहजादियों ने तालीम पाई है, उसमें तवायफ को बैठाने पर न उतर आता।'

बड़े मियां बारादरी छोड़कर चले गए। महफिल का रंग उतर गया तो सआदत का नशा भी काफूर हो गया। लेकिन करते भी क्या, बात बहुत दूर जा चुकी थी। उस महफिल का आयोजन राजा टिकैत राय ने किया था। सआदत जब अगली सुबह उनसे मिले तो बेहद शर्मिंदा थे।