किसी भी देश के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जिनका असर कई युगों तक रहता है। भारत में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से देश की आधी आबादी को मिलने वाले पूरे हक को इसी रूप में देखा जा सकता है। पूरा हक इसलिए कह रही हूं क्योंकि यह कानून महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ सामाजिक चेतना भी लाएगा।
हर वर्ग को मिलेगा लाभ
बेटियों के लिए जितनी संभावनाएं बढ़ती हैं, उतना ही समाज में उनके लिए सम्मान और सुरक्षा का भाव बढ़ता है। बेटियों को कोख में मारने वाली सोच ऐसे बदलावों से हारती है। देश को विकसित बनाने की दिशा में यह कदम मील का पत्थर साबित होगा, क्योंकि आधी आबादी को राजनीति और नीति-निर्माण में भागीदार बनाने का असर समूचे परिदृश्य पर नजर आएगा। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' का भाव सही मायने में तब सार्थक होगा, जब इस देश की बेटियों को घर के अंदर और बाहर पूर्ण सम्मान मिलेगा।
सरकार ने अगले आम चुनाव से ही महिला आरक्षण लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इसका मतलब सरकार ने ठान लिया है कि अब और देरी नहीं। इसका लाभ देश के सभी वर्ग की महिलाओं को मिलेगा, मुस्लिमों को भी। खास मुस्लिम महिलाओं का जिक्र इसलिए क्योंकि तुलनात्मक रूप से उनका प्रतिनिधित्व काफी कम है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम ऐसा ऐतिहासिक संकल्प है, जो दशकों की प्रतीक्षा के बाद साकार हुआ है और अब 2029 में अपने पूर्ण प्रभाव के साथ भारत की राजनीति को नई पहचान देने की ओर अग्रसर है।
सरकार ने वह किया, जो पहले केवल राजनीतिक वादों तक सीमित था। कुछ तारीखें हमें याद रखनी होंगी। सितंबर 2023 में यह विधेयक संसद से पारित हुआ था और उसी महीने इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई। यह भारत की राजनीति में शक्ति संतुलन का ऐतिहासिक पुनर्निर्माण था। 2029 में जब बदलाव जमीन पर दिखेगा, तो पूरी दुनिया के लिए यह एक उदाहरण होगा।
अब केंद्र में होंगी महिलाएं
महिला आरक्षण कोई नया विचार नहीं था, लेकिन इसे लागू करने का साहस ही नेतृत्व की असली परीक्षा थी। मोदी सरकार ने दृढ़ राजनीति इच्छाशक्ति दिखाई और परिणाम सामने है। जब यह जमीन पर उतरेगा तो संसद का चरित्र बदलेगा, निर्णय लेने की मेज पर महिलाओं की आवाज निर्णायक होगी। नीति निर्माण में महिलाओं के मुद्दों को ज्यादा जगह मिल पाएगी। दलित, पिछड़ा समाज, मुसलमान - हर वर्ग की महिलाओं को इसका लाभ मिलेगा।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम में सामाजिक मानसिकता को बदलने की ताकत है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा - हर क्षेत्र में महिला दृष्टिकोण केंद्र में आएगा। नेतृत्व अब 'पुरुष-प्रधान' नहीं, 'साझा शक्ति' का प्रतीक बनेगा। एक बड़ा बदलाव यह है कि भारत का लोकतंत्र पहली बार अपनी जनसंख्या की वास्तविक तस्वीर का प्रतिनिधित्व करेगा। सही मायने में यह कानून नहीं, युग परिवर्तन है। इसे केवल एक राजनीतिक निर्णय मानना उसकी व्यापकता को कम आंकना होगा। जब इतिहास लिखा जाएगा, तो यह कहा जाएगा कि भारत ने उस दौर में कदम रखा, जहां नारी शक्ति को केवल सम्मान नहीं, बल्कि सत्ता का समान अधिकार मिला। यही है नया भारत, जहां निर्णय की धुरी अब आधी नहीं, पूरी आबादी है।
खत्म हुआ दशकों का इंतजार
1990 के दशक से महिला आरक्षण विधेयक कई बार संसद में पेश हुआ। कभी विरोध के कारण, कभी दलगत राजनीति, तो कभी सामाजिक समीकरणों के दबाव में हर बार यह काम अधूरा रह गया। यह केवल एक कानून का रुकना नहीं था, इसकी वजह से आधी आबादी के अधिकारों का इंतजार लंबा होता चला गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि अब यह मुद्दा टलने वाला नहीं है। सरकार ने विशेष संसद सत्र बुलाया और इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया गया। जो काम वर्षों तक संभव नहीं हुआ, वह एक दृढ़ नेतृत्व ने कर दिखाया।
(लेखिका दिल्ली स्टेट हज कमिटी की अध्यक्ष हैं)


