शब्दों ने दी ताक़त

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टेनेसी के एक गरीब परिवार में जन्मीं विल्मा रूडोल्फ बचपन में लकवाग्रस्त हो गईं थीं। डॉक्टरों ने चलने से मना कर दिया था। मां के प्रोत्साहन से उन्होंने चलना शुरू किया और हार न मानते हुए दुनिया की सबसे तेज धाविका बनने का सपना देखा। 1960 के रोम ओलंपिक में उन्होंने तीन स्वर्ण पदक जीतकर यह सपना सच कर दिखाया।

wilma rudolph the incredible journey from paralyzed legs to olympic gold medal

सन 1940 में अमेरिका के टेनेसी के एक गरीब परिवार में एक बच्ची का जन्म हुआ, नाम रखा गया विल्मा। वह अपने माता-पिता की 20वीं संतान थीं। बचपन से ही उन्हें कई बीमारियों ने घेर लिया। चार साल की उम्र में वह निमोनिया और काला ज्वर की शिकार हो गईं, जिससे उनके पैरों में लकवा मार गया। डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि वह अब कभी चल नहीं पाएंगी। उनकी मां ब्लैंच रूडोल्फ ने कहा, ‘अगर तुम्हारे भीतर विश्वास और मेहनत है, तो कुछ भी असंभव नहीं।’ मां के कहे शब्दों ने विल्मा के भीतर नई शक्ति भर दी। नौ साल की उम्र में उन्होंने बिना सहारे से चलना शुरू किया। 13 साल की उम्र में पहली दौड़ में उतरीं पर हार गईं। फिर कई बार हारीं, लेकिन हर बार और मजबूत होकर उठीं। 15 साल की उम्र में उन्होंने कोच एड टेम्पल से कहा, ‘मैं दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती हूं।’ कोच ने उनकी लगन को पहचाना और मार्गदर्शन दिया। 1960 के रोम ओलिंपिक में विल्मा ने इतिहास रच दिया। 100 मीटर, 200 मीटर और 400 मीटर रिले दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर वह दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गईं।