त्याग की भावना हो तो सुख और शांति दूर की कौड़ी नहीं

Contributed byस्वामी अवधेशानंद गिरि|नवभारतटाइम्स.कॉम

त्याग की भावना से जीवन में सुख और शांति आती है। यह संसार एक गहरे आध्यात्मिक सत्य पर आधारित है। एक शुद्ध अंत:करण वाला साधक जीवन में अनुकूलताओं का अधिकारी बनता है। आध्यात्मिकता भीतर के अनुभव से है। सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति सभी के कल्याण से जुड़ा होता है। प्रेम, करुणा, दया जैसे गुण निर्मलता से जन्म लेते हैं।

attain happiness and peace with the spirit of sacrifice the true path of spirituality

यह संसार एक गहरे आध्यात्मिक सत्य पर आधारित है। जिस प्रकार नदियां खुद ब खुद सागर की ओर बहती हैं और सुगंधित फूलों की ओर अपने आप भौरें खींचे चले आते हैं, उसी प्रकार एक शुद्ध और जागृत अंत:करण वाला साधक जीवन में अनुकूलताओं का स्वाभाविक अधिकारी बन जाता है।

आध्यात्मिकता का अर्थ बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर के अनुभव से है। जब व्यक्ति यह जान लेता है कि उसके दुख, क्रोध और क्लेश का कारण कोई और नहीं, बल्कि वह स्वयं है, तब उसके भीतर परिवर्तन की शुरुआत होती है।ए

सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति वही है, जिसके कर्म केवल उसके निजी हित तक सीमित न होकर सभी के कल्याण से जुड़े हों। बाहरी परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, यदि व्यक्ति भीतर से प्रसन्न और संतुलित बना रहता है, तो वही उसकी आध्यात्मिक प्रगति का प्रमाण है। आध्यात्मिकता एक यात्रा है। प्रेम, करुणा, दया, उदारता और परोपकार जैसे गुण उसी निर्मलता से जन्म लेते हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं आनंदित रहता है और दूसरों के जीवन में भी सुख व शांति का संचार करता है। अध्यात्म ही वह आधार है, जो जीवन को सार्थकता और पूर्णता प्रदान करता है।

आध्यात्मिकता का सार यही है कि हम जीवन की एकता को पहचानें, अपने भीतर के दिव्य तत्व को अनुभव करें और ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को अपनाएं। यही सच्चे आनंद और शाश्वत सुख का मार्ग है।

प्रस्तुति : सुभाष चंद्र शर्मा