शांति में बाधा

नवभारतटाइम्स.कॉम

अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का संघर्षविराम आज समाप्त हो रहा है। इस्लामाबाद में बातचीत की तैयारी है, लेकिन अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका द्वारा ईरान के शिप को जब्त करना संघर्षविराम का उल्लंघन है। दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी है। होर्मुज से मुक्त आवागमन दुनिया के हित में है।

iran us ceasefire uncertainty tensions rise due to us action on hormuz

अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के लिए हुए संघर्षविराम का आज अंतिम दिन है। इस्लामाबाद में फिर से बातचीत की तैयारी चल रही है, लेकिन बातचीत हो पाएगी या नहीं, इसे लेकर अनिश्चितता अभी तक बनी हुई है और इसकी वजह है होर्मुज पर अमेरिका की उकसावे वाली कार्रवाई।

शिप जब्त । अमेरिका ने सोमवार को ईरान के एक कार्गो शिप को जब्त कर लिया, जो सीधे तौर पर संघर्षविराम का उल्लंघन है। एक तरफ डॉनल्ड ट्रंप बार-बार शांति समझौते की बात कर रहे हैं, लेकिन साथ में तेहरान को तबाह करने की धमकी भी दे रहे हैं। जब भी ऐसा लगता है कि तनाव कम हो रहा है और सुलह का कोई रास्ता निकल सकता है, तभी माहौल बिगाड़ने वाला कोई बयान आ जाता है, कोई कार्रवाई कर दी जाती है।

मार्केट में बेचैनी । बीते शुक्रवार को जब ईरान ने होर्मुज को सभी कमर्शल जहाजों के लिए खोलने का ऐलान किया और अमेरिका ने भी एक ईरानी शिप को रास्ता दिया, तो लगा था कि बात बन रही है। लेकिन, इसके बाद से जिस परिपक्वता और समझदारी की उम्मीद दोनों पक्षों से थी, वह देखने को नहीं मिली है। इसकी एक वजह यह है कि दोनों देशों को एक दूसरे पर भरोसा नहीं है।

गतिरोध बनीं शर्तें । ईरान का यह कहना कि उसने अभी तक अमेरिका के साथ बातचीत में शामिल होने का फैसला नहीं किया है, बेहद निराशाजनक है। ट्रंप इस वार्ता के लिए उत्साह तो जता रहे हैं, पर उसका तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक तेहरान भी उसमें शामिल नहीं होता। और तेहरान के शामिल होने में सबसे बड़ी बाधा है अमेरिका की शर्तें और उसकी नाकाबंदी।

मुक्त हो होर्मुज । बातचीत अल्टीमेटम के साथ नहीं चल सकती। दुनिया के हित में सबसे पहली जरूरत है होर्मुज से मुक्त आवागमन। अमेरिका और ईरान, दोनों को इस रास्ते को पहरे से मुक्त करना चाहिए। वैश्विक ऊर्जा संकट को दूर करने के साथ-साथ यह कदम आपसी भरोसे के लिए भी जरूरी है।

मौका न छूटे । जब ट्रंप के 'प्रिय' फील्ड मार्शल असीम मुनीर को यह समझ आ रहा है कि ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी दोबारा बातचीत शुरू करने में सबसे बड़ा रोड़ा है, तो वाइट हाउस को भी बात समझ आ जानी चाहिए। अगर बातचीत का मौका हाथ से निकलता है, तो यह दुनिया के लिए बहुत बड़ा झटका होगा और अभी तक किए गए सारे प्रयास विफल हो जाएंगे।