आम बोलचाल में ‘फांकी’ शब्द का अर्थ चूर्ण के रूप में बनने वाली आयुर्वेदिक औषधि है। इसी से फांकना शब्द बना है, जैसे भूंजा फांकना। ‘धूल फांकना’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ होता है- इधर-उधर भटकना, मारा-मारा फिरना। लेकिन, जब कहते हैं 'फांकी मारना', तो इसका अर्थ हो जाता है - कामचोरी या फिर किसी काम से चतुराई के साथ जी चुराना। बिहार, झारखंड और अन्य हिंदीभाषी इलाकों में फलों के टुकड़े को फांक कहते हैं, जैसे नारंगी की फांक। इसके लिए फलक शब्द का भी इस्तेमाल होता है। इसी तरह अचार के लिए बनने वाले आम या नींबू के टुकड़ों को भी ‘फांक’ कहा जाता है। यशपाल की कहानी ‘लखनवी अंदाज’ की यह पंक्ति फांक को और स्पष्ट करती हैं, ‘नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फांकों पर जीरा मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरक दी।’ जब कोई चीज ठीक से जुड़ती नहीं और बीच में खाली जगह रह जाती है, तो उस अंतर को भी ‘फांक’ कहा जाता है। इस तरह से यह शब्द व्यवहार और प्रयोग की अलग-अलग स्थितियों को व्यक्त करता है।


