पूनम पाण्डे
महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने की बात बरसों से घूम-फिर कर बहस, राजनीति और दिखावे में ही अटकी रह जाती है। अब और इंतजार करना मुश्किल है, इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि नो इफ, नो बट, जस्ट नाऊ। यानी अब कोई किंतु-परंतु नहीं, यह तुरंत लागू होना चाहिए। 1990 के दशक से ही इस पर बातें हो रही हैं। समितियां बनाई जा रही हैं, विधेयक आते-जाते रहे हैं और हर साल महिला दिवस पर नए-नए वादे किए जाते हैं। 2023 में जब नारी शक्ति वंदन विधेयक पारित हुआ, तो इसे ऐतिहासिक बताया गया। पर, 3 साल बाद भी सवाल वही है - कौन महिलाओं के साथ है और कौन खिलाफ?
3 साल तक चुप्पी क्यों
जो नेता आज महिलाओं को हक देने की बात कर रहे हैं और परिसीमन का विरोध भी जता रहे हैं, उनसे बस एक ही सवाल है कि 2023 में बिल पास होने के बाद उन्होंने अब तक क्या किया? अगर मंशा साफ थी तो इसे तुरंत लागू करने के उपाय क्यों नहीं खोजे गए? जनगणना और परिसीमन की शर्तें क्यों जोड़ी गईं? क्या 543 सीटों की लोकसभा में महिलाओं को 33% हिस्सेदारी देने के पक्ष में कोई भी राजनीतिक दल नहीं है? और जो पार्टियां यह कह रही हैं कि हम मौजूदा ढांचे पर ही आरक्षण लागू करने के लिए तैयार हैं, वे क्यों नहीं दबाव बना रहीं? जो दल दावा कर रहे हैं कि वे आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन के खिलाफ हैं, उन्होंने क्या विकल्प दिया है? क्या महिला आरक्षण लागू करने के लिए कोई सड़कों पर उतरा?
कोई भी दल महिला विरोधी नहीं कहलाना चाहता। हर कोई खुद को महिलाओं का सबसे बड़े हितैषी दिखाने में लगा है। लेकिन, बड़ा सवाल यही है कि 2023 में बिल पास होने के बाद तुरंत काम क्यों नहीं शुरू हुआ? यह असंभव तो नहीं था। इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में कई बार असंभव भी संभव हुआ है। जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाना एक वक्त नामुमकिन लगता था, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति से वह भी मुमकिन हो गया। फिर महिला आरक्षण पर ही क्यों कानूनी और प्रक्रियात्मक अड़चनें सामने आती हैं?
लॉटरी सिस्टम से हल
हमारे देश में संविधान के जानकार और कानूनविदों की कमी नहीं। उनकी राय से इसका भी रास्ता निकाला जा सकता है। संसद का विशेष सत्र बुलाकर तय किया जा सकता है कि मौजूदा ढांचे में ही क्यों न हो, लेकिन 2027 से आधी आबादी के लिए आरक्षण लागू किया जा सकता है। लॉटरी सिस्टम से सीटें तय की जा सकती हैं कि कौन-सी 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
नई व्यवस्था बनने तक इस मॉडल पर काम किया जा सकता है। बस शुरुआत करने की देर है। लेकिन, असल सवाल है कि जब रायबरेली, गांधीनगर, हाजीपुर या सेरामपुर (श्रीरामपुर) जैसी बड़ी और सुरक्षित मानी जाने वाली सीटें आरक्षित हो जाएंगी, क्या तब भी सभी राजनीतिक दल उसी मजबूती से उसका समर्थन करेंगे या फिर वही पुरानी राजनीति शुरू हो जाएगी? आखिर में सवाल वही बचता है कि महिलाओं को आरक्षण देने में पार्टियों की नीयत साफ है या नहीं? इसका जवाब सिर्फ भाषणों से या वादों से नहीं हो सकता। जमीनी हकीकत भी वैसी ही होनी चाहिए। जब तक आरक्षण लागू नहीं हो जाता, तब तक सिर्फ राजनीति होने से नीयत पर सवाल तो उठेंगे ही।


