दुनिया गोल है, संसार माया है, जीवन कुछ नहीं जन्म मरण का चक्र है…। तमाम विचार सुबह से दिमाग में आ रहे हैं। पिछले सप्ताह का तो आपको याद होगा, प्रदूषण वाले ने हमें यह कहकर भगा दिया कि जाओ पहले बाइक की आरसी पर अपना फोन नंबर लिखवा कर आओ।
आज सुबह फिर उसके ठिए पर पहुंचे। गद्दी खाली देखी तो फोन किया। पता चला कि पास के देशी ठेके पर खड़े होकर विदेश नीति पर व्याख्यान दे रहे थे। आते ही उन्होंने बाइक के डिटेल चेक किए। मुंह टेढ़ा करके बोले, नहीं हो सकता बॉस। हमने पूछा, करवा तो लिया नंबर अपडेट, अब क्या? प्रदूषण वाले बोले, बाइक में HSRP नंबर प्लेट नहीं लगी है। अब खून खौल गया। आवाज ऊंची करके हमने कहा, पांच साल पहले ही लगवा चुके हैं। प्रदूषण वाले भइया बिना प्रभावित हुए बोले, प्रदूषण विभाग में अपडेट नहीं है। RTO ऑफिस जाइए, अपडेट करवाइए। चुपचाप घर पहुंचे। दरवाजे पर इंजीनियर साहब तैनात मिले। महीने भर बाद गांव से छूटकर आए हैं। अपनी बीमार चाची की देखभाल करने गए थे, तेरहवीं के बाद लौटे हैं। तब से अजीब से हो गए हैं। हर चीज को गैस की किल्लत से जोड़कर देख रहे हैं। हमारी बात सुनकर बोले, बताइए… गैस ज्यादा हो तो समस्या, कम हो तो समस्या। सरकार क्या क्या करे, गैस का बंदोबस्त करे या आपका प्रदूषण संभाले? मूड खराब तो पहले से ही था, अब और खराब हो गया। हमने कहा, जा रहे हैं RTO ऑफिस, लेट हो जाएंगे। इंजीनियर साहब कहां मानने वाले थे, बोले, अरे साहब, पंक्चुअल तो हमारे कॉलेज के प्रिंसिपल हौसला प्रसाद सिंह थे। कोई लेट हो जाए तो कॉलर पकड़कर पूछते थे, 'वाई आर यू स्टिल लेट? इंजीनियर साहब को हौसला प्रसाद सिंह की यादों में भटकता छोड़ हम घर के अंदर घुसे। RTO ऑफिस जाने की हिम्मत तो नहीं लेकिन पिछले सप्ताह एक मित्र ने कहा था- RTO ऑफिस के पास नान और छोले-कुल्छे बहुत अच्छे मिलते हैं सर। वो भी खाकर आइएगा। अब इसी उम्मीद में हम आग का दरिया पार करने की हिम्मत जुटा रहे हैं।


