उत्तर भारत पहले ही घाटे मेंअब और नुक़सान क्यों देना

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लोकसभा सीटों की संख्या 50% तक बढ़ाने का प्रस्ताव आया है। इसका उद्देश्य जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व को सुधारना और महिला आरक्षण लागू करना है। उत्तर भारत के राज्यों को इससे फायदा हो सकता है। दक्षिण के राज्य आर्थिक रूप से प्रगतिशील हैं। यह प्रस्ताव देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

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लोकतंत्र में हर नागरिक के वोट की कीमत बराबर होनी चाहिए, पर भारत में ऐसा नहीं है। BJP ने लोकसभा सीटों का नए सिरे से बंटवारा करने और प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या 50% तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जिस पर उसे विपक्ष के जोरदार विरोध का सामना करना पड़ा। विपक्ष का ऐतराज ज्यादा मजबूत नहीं दिखता। वहीं, BJP भी इसमें अपना फायदा देख रही है। लेकिन, इस बार BJP के पास मजबूत तर्क हैं।

तीन फायदे । लोकसभा की सीटें 50% तक बढ़ाने के तीन फायदे होंगे। पहला, 2002 के बाद जनसंख्या में बदलाव के मुताबिक प्रतिनिधित्व में सुधार होगा। दूसरा, हर सीट पर अत्यधिक मतदाताओं का दबाव भी घटेगा। तीसरा, महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू करने के लिए पर्याप्त सीटों की जरूरत भी पूरी हो जाएगी।

बराबर प्रतिनिधित्व । भारत में पहली बार जब चुनाव हुए थे, तब से ही आबादी के आधार पर बराबर प्रतिनिधित्व देने की कोशिश रही। हालांकि, 1976 में संशोधन कर सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर कर दिया गया था। इसका उद्देश्य फैमिली प्लानिंग में आगे रहने वाले राज्यों को सजा देने से बचाना था। तब यह भी कहा गया था कि ऐसा दक्षिण भारत में राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है।

उल्लंघन आम । इससे समान मतदान शक्ति का सिद्धांत कमजोर हुआ। दुनिया के किसी अन्य देश में फैमिली प्लानिंग के नाम पर समझौता नहीं किया जाता। विभिन्न समुदायों में प्रजनन दर अलग-अलग रही है। इसके बावजूद किसी भी देश में बेहतर प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों को इनाम देने के लिए सीटें फ्रीज करने जैसी व्यवस्था नहीं अपनाई गई। भारत में यह उल्लंघन अब सामान्य मान लिया गया है। दक्षिण के राज्य इसे लोकतांत्रिक खामी नहीं, फैमिली प्लानिंग का इनाम मानते हैं।

चुनावी रणनीति । अमेरिका की जनता ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ नारा दिया था, 'प्रतिनिधित्व के बिना टैक्स नहीं।' लगता है भारत में हमने नया नारा गढ़ लिया है, नसबंदी के बिना प्रतिनिधित्व नहीं। पहले तय किया गया था कि 2001 की जनगणना के बाद सीटों पर लगी यह रोक हटा दी जाएगी, मगर इसे 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया। लग रहा था कि BJP हिंदी पट्टी में आबादी के आधार पर सीटें बढ़ाएंगी। पर, पार्टी ने सभी राज्यों में जनसंख्या की परवाह किए बगैर सीटों में 50% वृद्धि का प्रस्ताव देकर अलग रास्ता चुना। महिला आरक्षण इसका अहम हिस्सा है। अगर विपक्ष समर्थन न दे तो BJP उसे महिला विरोधी बता सकती है।

प्रगतिशील दक्षिण । विपक्ष के सामने दुविधा है। परिसीमन का समर्थन करने पर उसकी साख को धक्का लगने का खतरा है। प्रस्ताव का विरोध करने पर आधी आबादी की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी चाहते हैं कि टैक्स, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सामाजिक प्रदर्शन भी सीटें तय करने का आधार बनें। दक्षिण के राज्य आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे प्रगतिशील हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रजनन दर के उनके आंकड़े बेहतरीन हैं।

उत्तर भारत पीछे । अगर बड़े राज्यों के प्रति व्यक्ति राज्य GDP देखें तो तेलंगाना 3.56 लाख रुपये के साथ सबसे आगे है। इसके बाद कर्नाटक (3.32 लाख), हरियाणा (3.25 लाख), तमिलनाडु (3.15 लाख) और केरल (2.81 लाख रुपये) का स्थान है। सूची में सबसे नीचे बिहार (60,337 रुपये), उत्तर प्रदेश (93,514 रुपये) और झारखंड (1.05 लाख रुपये) जैसे राज्य हैं। दक्षिण भारत राज्यों ने फैमिली प्लानिंग और बेहतर नीतियों से आर्थिक बढ़त हासिल की है, इसलिए उन्हें असमान सीटों के जरिये अतिरिक्त राजनीतिक इनाम की जरूरत नहीं दिखती। वहीं उत्तर भारत के राज्यों ने फैमिली प्लानिंग की अनदेखी कर आर्थिक नुकसान झेला है।

BJP का अलग रुख । रेवंत रेड्डी कहते हैं कि दक्षिण भारत के राज्य केंद्र की आय में अधिक योगदान देते हैं। मगर, प्रोग्रेसिव टैक्सेशन का सिद्धांत बताता है कि अमीर ज्यादा देकर गरीबों की मदद करते हैं। जैसे अरबपति ज्यादा टैक्स देते हैं, पर उन्हें अतिरिक्त वोट शक्ति नहीं मिलती। इसी तरह ज्यादा योगदान राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार नहीं बन सकता। इस मुद्दे पर BJP का रुख उम्मीद से उलट रहा है और हिंदी पट्टी को सीधा फायदा नहीं दिया। ऐसे में विपक्ष के पास इसे स्वीकार कर संवैधानिक संशोधन का समर्थन करने का विकल्प मौजूद है।