Pandit Rajendra Gangani Innovation In Kathak And The Confluence Of Fathers Legacy
कथक में कुछ नया करता रहता हूं
नवभारतटाइम्स.कॉम•
कथक के जयपुर घराने के प्रसिद्ध गुरु और नर्तक पंडित कुंदनलाल गंगानी का यह जन्मशताब्दी वर्ष है। उनके पुत्र, प्रसिद्ध कथक नर्तक और गुरु पंडित राजेंद्र गंगानी युवा कलाकारों को मंच प्रदान करने और विभिन्न घरानों के वरिष्ठ कलाकारों को एक मंच पर लाने की भावना के साथ देश-दुनिया में जन्मशताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहे हैं। आलोक पराड़कर ने उनसे खास बातचीत की। मुख्य अंश :
n कथक के जयपुर घराने में कई शाखाएं, परिवार और गुरु रहे। अपने पिता पं. कुंदनलाल गंगानी के योगदान को कैसे देखते हैं? जयपुर घराने की कई शाखाएं रही हैं और अगर कहें कि यह गांव-गांव में बसा रहा है, तो गलत नहीं होगा। लेकिन, खास है कि सभी ने अपनी विशेषताओं को अलग-अलग रखा। पिताजी ने एक अलग बात की। उन्होंने गांवों की मिट्टी की खुशबू को कथक में शामिल रखने की कोशिश की। वह जब राजस्थान से बाहर निकले तो उनकी इच्छा थी कि प्रस्तुतियों में राजस्थानी संस्कृति झलके। इसके लिए उन्होंने राजस्थान के लोक तत्व और यहां के लोक संगीत की खूबियों को कथक में शामिल करते हुए जयपुर घराने का विकास किया। राजस्थानी लोकगीतों का, मीरा के भजनों का कथक में खूब उपयोग किया। उन्होंने कई ऐसे अंग संचालन विकसित किए, जिन्हें आज भी खूब किया जा रहा है।
n उन्होंने बोलों, तिहाइयों, परनों और विलंबित लय की गतें बनाकर कथक को समृद्ध किया?
बिल्कुल। ये काफी प्रचलित हुए, लेकिन वह अदायगी के पक्षधर नहीं थे। वह वीर रस के साथ भक्ति और शृंगार तो चाहते थे, लेकिन महफिल के खिलाफ थे। वह अदाओं के जरिये आकर्षित या अचंभित करने की जगह उसे एक अलौकिक मार्ग पर ले जाना चाहते थे।
n लखनऊ घराने का कथक नवाबों के दरबार में विकसित हुआ, लेकिन इसके समानांतर जयपुर घराना राजपूत राजाओं के संरक्षण में रहा और मुगल संस्कृति के प्रभाव से बचा रहा?
जी बिल्कुल, इसीलिए इसमें वीर रस की प्रधानता है। राजपूत राजाओं के संरक्षण और मंदिरों का जयपुर घराने पर प्रभाव रहा। हमारे घराने में वीरता, शक्ति के साथ ही भक्ति, विनती और समर्पण भी है। भक्ति रचनाएं भी खूब रहीं, लेकिन गजल इधर नहीं आई, ठुमरी भी कम ही रही।
n जयपुर घराने का नृत्य पुरुष प्रधान माना गया। पर, बाद में महिलाएं खूब आने लगीं।
देह किसी की भी हो, कला को संवारने का काम गुरु का है। हमारे पास लड़के-लड़कियां, दोनों सीखते हैं और यही गुरु का महत्व है कि वह कैसे दोनों को तैयार कर रहा है। पहले यहां भी पुरुषों का वर्चस्व रहा है, लेकिन धीरे-धीरे वह टूट गया। दूसरी बात, हमारे गुरुओं ने नृत्यांगनाओं को भी वैसे ही तैयार किया। कोई भेदभाव नहीं किया है।
n पिता और गुरु की इस परंपरा में आपने क्या नया जोड़ने का प्रयास किया?
मेरा प्रयास जड़ों को सींचने का रहा है। साथ ही मैं इस बात को लेकर भी सतर्क रहा हूं कि रूढ़िवादी न बनूं। इसीलिए कथक में हमेशा कुछ न कुछ नया करने का प्रयास भी जारी रहा है। नई तरह की संरचनाएं भी कीं, लेकिन एक बात की हमेशा कोशिश रही है कि जो कुछ भी करूं उसमें कथक नजर आना चाहिए। हमारी प्रस्तुति में यह कभी नहीं लगना चाहिए कि परंपरा को हमने छोड़ दिया है। मेरा मानना है कि नृत्य तो हमेशा नया ही होता है।
n आपके पिता एकल नृत्य के पक्षधर थे। आपने समूह नृत्य संयोजन अधिक किया है?
पिताजी का मानना था कि कलाकार को पहले अच्छी तरह तैयार हो जाना चाहिए। ऐसा एकल नृत्य के जरिए ही संभव होता है। एक गुरु अपने शिष्य-शिष्याओं को अलग-अलग तरह से तालीम देता है। उनकी प्रतिभा को समझकर उस तरह से प्रयास करता है और हर विद्यार्थी एक भिन्न पहचान देना चाहता है। समूह में शामिल होने की जगह सबकी अपनी पहचान जरूरी है। यह सच है कि मैंने समूह नृत्यों का काफी संयोजन किया। आज इसकी जरूरत है, लेकिन यह भी सच है कि समूह नृत्य में नृत्य संयोजन करने वाला ही महत्वपूर्ण हो जाता है। शिष्य-शिष्याओं को तैयार करते समय मैं हमेशा एकल नृत्य के माध्यम से ही उन्हें शिक्षित करता हूं।
n पंडित कुंदनलाल गंगानी की जन्म शताब्दी पर क्या-क्या आयोजन हो रहे हैं?
हमने मार्च में अमेरिका से जन्मशताब्दी समारोह का आरंभ किया था। जुलाई में जयपुर, दिल्ली, लुधियाना, पुणे में नृत्य समारोह आयोजित किए गए। कनाडा में भी समारोह हुआ। हमारी कोशिश है कि विभिन्न नगरों और देशों में जन्मशताब्दी के आयोजन किए जाएं, जिनमें युवा कलाकारों को मौका मिले। जयपुर ही नहीं, कथक के दूसरे घरानों के प्रतिष्ठित कलाकारों के भी नृत्य आयोजित करने का प्रयास रहा। इसके पीछे मेरी यह भावना रहती है कि युवा कलाकारों को अवसर देने के लिए हमें केवल सरकार पर आश्रित नहीं होना चाहिए। ऐसे अवसरों पर उनको मंच देने की कोशिश कर सकते हैं। इन समारोहों में पंडित कुंदनलाल गंगानी की रचनाओं की विशेष प्रस्तुतियां भी की जा रही हैं।