रावण की माया जैसी है AI की डीपफेक तकनीक

Contributed byसोमनाथ सरकार|नवभारतटाइम्स.कॉम
deepfake technology from the illusion of ramayana to the deception of ai
आज आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक तकनीक को लेकर पूरी दुनिया में चिंता है। यह तकनीक किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज और हाव-भाव इतनी वास्तविकता से प्रस्तुत कर सकती है कि सच और झूठ में अंतर करना कठिन हो जाता है। लेकिन, यदि भारतीय महाकाव्यों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि भ्रम और रूप बदलकर छल करने की अवधारणा कोई नई नहीं।

रामायण में मारीच का स्वर्ण मृग बनकर राम को दूर ले जाना और बाद में राम की आवाज में लक्ष्मण को पुकारना एक ऐसी साजिश थी, जिसने सीता का अपहरण करा दिया। रावण का साधु वेश धारण करना भी छल का ही एक रूप था। उस समय इसे माया कहा जाता था, आज यही काम तकनीक के माध्यम से डीपफेक कर रही है। बेशक, पौराणिक कथाओं और आधुनिक तकनीक की तुलना वैज्ञानिक आधार पर नहीं की जा सकती। मिथक आस्था, प्रतीक और नैतिक संदेशों की दुनिया से जुड़े हैं, जबकि विज्ञान प्रयोग, तर्क और प्रमाण पर आधारित है। फिर भी दोनों के बीच एक रोचक समानता दिखाई देती है- मनुष्य की कल्पनाशक्ति।
फ्रांसीसी लेखक जूल्स वर्न ने अपनी विज्ञान कथाओं में पनडुब्बी और अंतरिक्ष यात्रा जैसी कल्पनाएं की थीं, जो बाद में वास्तविकता बनीं। इसी तरह रामायण का पुष्पक वैज्ञानिक विमान नहीं था, लेकिन उड़ने की मानव कल्पना का प्रतीक अवश्य था। दरअसल, मिथक और विज्ञान दो अलग रास्ते हैं, लेकिन दोनों की शुरुआत मनुष्य की जिज्ञासा और कल्पना से होती है। कल्पना प्रश्न पैदा करती है, प्रश्न खोज को जन्म देते हैं और खोज अंत में आविष्कार का रूप लेती है। इसलिए कल्पना को केवल काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हर महान आविष्कार कभी किसी के मन में जन्मी एक कल्पना ही था। विज्ञान उस कल्पना को तर्क और प्रयोग के आधार पर वास्तविकता में बदलता है। शायद यही कारण है कि विज्ञान और आध्यात्मिक-दार्शनिक कल्पना के बीच दिखाई देने वाली दूरी कई बार उतनी बड़ी नहीं होती, जितनी हम समझते हैं। मानव की रचनात्मक कल्पना ही वह पुल है, जो मिथक, विज्ञान और भविष्य को आपस में जोड़ती है।