आइंस्टाइन की जिज्ञासा

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einsteins curiosity the journey from a compass to the theory of relativity
अल्बर्ट आइंस्टाइन केवल पांच वर्ष के थे, जब उनके पिता ने उन्हें एक छोटा-सा कंपास उपहार में दिया। वह कंपास की सुई को बार-बार घुमाते, लेकिन वह उत्तर दिशा की ओर ही स्थिर हो जाती। इस साधारण-सी घटना ने बालक आइंस्टाइन के मन में एक गहरा प्रश्न जगा दिया- आखिर ऐसी कौन-सी अदृश्य शक्ति है जो सुई को सही दिशा दिखाती है? यही प्रश्न उनकी जिज्ञासा की नींव बन गया। विद्यालय में आइंस्टाइन हर बात का कारण जानना चाहते थे। उनकी प्रश्न पूछने की आदत कई शिक्षकों को पसंद नहीं आती, लेकिन उन्होंने कभी अपनी जिज्ञासा का साथ नहीं छोड़ा। निरंतर अध्ययन, गहन चिंतन और अथक परिश्रम के बल पर उन्होंने विज्ञान के अनेक रहस्यों को उजागर किया। वर्ष 1905 में एक साधारण पेटेंट कार्यालय में कार्य करते हुए, उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया और E=mc² जैसे क्रांतिकारी समीकरण से विज्ञान की दिशा बदल दी। उन्होंने विज्ञान को मानवता की सेवा का साधन भी माना। आइंस्टाइन का जीवन हमें सिखाता है कि महान उपलब्धियों की शुरुआत किसी बड़े अवसर से नहीं, जिज्ञासा और इच्छा से होती है। जिज्ञासु मन ही नई खोजों और नए भविष्य का निर्माण करता है।