सावन के जल से शांत होना चाहिए अहंकार, क्रोध

Contributed byदेवेंद्रराज सुथार|नवभारतटाइम्स.कॉम
sawan month a time to quell ego and anger
सावन का महीना शुरू हो गया है। जैसे तपती धरती पहली वर्षा की बूंदों से तृप्त हो उठती है, वैसे ही मनुष्य का मन भी भक्ति की शीतल धारा से नया जीवन पाता है। इसलिए भारतीय परंपरा में सावन को भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र समय माना गया है। सावन यह संदेश देता है कि जब मन श्रद्धा से सराबोर होता है, तभी जीवन में शांति , संतुलन आती है।

सावन में भगवान शिव का जलाभिषेक यह स्मरण कराता है कि हमारे भीतर का अहंकार , क्रोध और ईर्ष्या भी भक्ति के जल से शांत होने चाहिए। समुद्र मंथन का विष अपने कंठ में धारण करने वाले नीलकंठ शिव स्वयं कष्ट सहकर संसार के लिए करुणा और शांति बचाए रखने की सीख देते हैं। कांवड़िए जब गंगाजल लेकर लंबी पदयात्रा करते हैं, तो यह उनकी आत्मानुशासन, धैर्य और समर्पण की साधना होती है। सावन की हरियाली आशा का संदेश देती है। इसी प्रकार मनुष्य का हृदय भी श्रद्धा, विश्वास और आत्मचिंतन से खिल सकता है। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में सावन हमें कुछ क्षण ठहरकर स्वयं को देखने, प्रकृति से जुड़ने और शिव की सरलता, विनम्रता व संतुलन को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है।