जवाबदेही की शोकसभा

नवभारतटाइम्स.कॉम
funeral of accountability responsible ones in the circle of question marks a web of inquiry committees
सुखनंदन-सुधर्मा सभागार में पहुंचे तो वातावरण शोकाकुल था। मंच पर बड़ा-सा फ्रेम और ऊपर बैनर था- ‘ जवाबदेही जी की शोकसभा।’ फ्रेम में तस्वीर के स्थान पर प्रश्नचिह्न था। सभा में धीरे-धीरे जिम्मेदार पहुंच रहे थे। सुधर्मा की मंच पर दृष्टि गई, तो उन्हें कुछ खटका।

‘ये जवाबदेही जी की जगह प्रश्नचिह्न क्यों है?’ सुधर्मा ने पूछा। ‘क्योंकि, उनका चेहरा तय नहीं है।’ सुखनंदन ने जवाब दिया। ‘जन्म-मृत्यु के समय का स्थान भी रिक्त है?’ प्रतिप्रश्न उठा। सुखनंदन बोले, ‘किसी को यह नहीं पता कि जवाबदेही कब जन्मी थी। मृत्यु का समय तय नहीं हो पाया, क्योंकि जवाबदेही जी एक दिन में नहीं बल्कि तिल-तिल कर मरी हैं।’
जयचंद धीरे से बोले, ‘कहानी कुछ और भी है।’ पति-पत्नी की प्रश्नवाचक निगाह उठी। जयचंद खुसपुसाए, ‘चर्चा है कि जिम्मेदारी और जवाबदेही एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे। राजशाही में भी इनके प्यार पर कभी आंच नहीं आई। फिर समय बदला। प्रगति हुई। प्रगति के मापन और पोषण को नई संस्कृति जन्मी। यह व्यवस्था की लाड़ली थी, उसे जिम्मेदारी से तो प्रेम था, लेकिन जवाबदेही से नफरत जबकि जिम्मेदारी-जवाबदेही दोनों ही उस पर जान छिड़कते थे। इसने जिम्मेदारी और जवाबदेही के बीच की दूरी बढ़ा दी। जिम्मेदारी आंखों का तारा बन गई, जवाबदेही को पत्थर मारा जाने लगा। इस वियोग में बेचारी दम तोड़ गई।’

अचानक मंच से आवाज आई, ‘हम जवाबदेही जी के मूल्यों को आगे बढ़ाएंगे।’ सुधर्मा बुदबुदाई, ‘मूल्यों को आगे बढ़ा रहे होते तो शोकसभा क्यों करनी पड़ती।’ मंच की आवाज और तेज हो गई, ‘इस आकस्मिक मृत्य की जांच की जाएगी।’ जांच समिति बनी। उसकी संस्तुतियों का अध्ययन करने को दूसरी समिति बनाई गई। एक तीसरी समिति ने इन दोनों निष्कर्षों को खारिज कर दिया। जांच में देरी की जवाबदेही तलाशने के लिए अब चौथी समिति का गठन किया गया है।