इन पार्कों में बुना जा रहा भारतीय कपड़ों का भविष्य

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सदियों से भारत की सांस्कृतिक पहचान वस्त्रों के ताने-बाने से बुनी रही है। कश्मीर के पश्मीना की गर्माहट, असम के मूंगा रेशम की चमक, तमिलनाडु की राजसी कांजीवरम, चंदेरी की पारंपरिक बुनावट और सूरत का वस्त्र कौशल हमारी समृद्ध विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। आज भी यह क्षेत्र जीडीपी में 2.3%, औद्योगिक उत्पादन में 13% और निर्यात में 12% का योगदान देकर हमारी अर्थव्यवस्था का सशक्त स्तंभ बना हुआ है। इससे 4.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष और 10 करोड़ से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष आजीविका मिल रही।

इकोसिस्टम की चुनौतियां
वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के एकीकृत इकोसिस्टम के विपरीत, भारत की कपड़ा मूल्य शृंखला ऐतिहासिक रूप से भौगोलिक रूप से बिखरी रही है। कताई, बुनाई, प्रॉसेसिंग, गारमेंटिंग और निर्यात जैसी गतिविधियां अलग-अलग राज्यों में स्वतंत्र रूप से विकसित हुईं। इससे एक परिधान को तैयार होने तक कई राज्यों की सीमाएं पार करनी पड़ती थीं। इस बिखरे ढांचे ने उत्पादन इकाइयों के विस्तार, आधुनिकीकरण और ऑटोमेशन में ढांचागत बाधाएं खड़ी कीं। इससे वैश्विक बाजारों में हमारी ‘स्पीड टू मार्केट’ की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है।

इसके अतिरिक्त, वस्त्र उद्योग वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 8 से 10% और औद्योगिक जल प्रदूषण में 20% का भागीदार है। हजारों बिखरी और छोटी इकाइयों के बीच पर्यावरण नियमों को लागू करना और अपशिष्ट जल का सतत प्रबंधन करना प्रशासनिक रूप से एक बेहद जटिल चुनौती रही है।

'5F' का विजन

इन बाधाओं को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में 4,445 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान के साथ 'पीएम मित्र' (PM MITRA) योजना शुरू की। यह एक ऐसा समग्र मॉडल प्रस्तुत करता है, जहां केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत और निजी भागीदारों के साथ पूर्ण समन्वय बिठाकर वस्त्र क्षेत्र के विकास को गति दे रही है।

इस योजना के मूल में प्रधानमंत्री का दूरदर्शी '5F' फॉर्म्युला - फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैक्ट्री, फैक्ट्री टू फैशन, फैशन टू फॉरेन निहित है। औद्योगिक विस्तार के साथ-साथ कपास उत्पादकों, ग्रामीण बुनकरों से लेकर निर्यातकों तक, हर वर्ग का कल्याण सुनिश्चित करना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है।

रणनीतिक रूप से प्रमुख कच्ची सामग्री केंद्रों के समीप स्थित होने के कारण ये पार्क परिवहन लागत घटाते हैं और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं। इससे उत्पादों की उत्पत्ति और प्रामाणिकता (एंड-टू-एंड ट्रेसेबिलिटी) की कड़ाई से निगरानी संभव है। एक ही परिसर में 1,000 से अधिक एकड़ भूमि पर कताई, बुनाई और परिधान निर्माण को एक साथ लाने से कई राज्यों में परिवहन की जरूरत खत्म हो जाती है। इससे लागत और कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। 'डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स' और एक्सप्रेस-वे से निकटता के कारण विदेशी बाजारों तक माल पहुंचाने का खर्च कम होगा। प्रत्येक पार्क 'प्लग-एंड-प्ले' बुनियादी ढांचे, समर्पित बिजली सब-स्टेशन, निरंतर जलापूर्ति, रेडी-टू-मूव-इन फैक्ट्री शेड और 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' (ZLD) आधारित अपशिष्ट उपचार संयंत्रों (CETP) से लैस है।

निवेश में गति, रोजगार के मौके

सात 'पीएम मित्र पार्क’ स्थापित किए जा रहे हैं- पांच ग्रीनफील्ड परियोजनाएं (तमिलनाडु के विरुधुनगर, गुजरात के नवसारी, कर्नाटक के कलबुर्गी, मध्य प्रदेश के धार और उत्तर प्रदेश के लखनऊ में) और दो ब्राउनफील्ड परियोजनाएं (तेलंगाना के वारंगल और महाराष्ट्र के अमरावती में)। इस योजना ने निवेशकों में भारी विश्वास जगाया है, जिसके तहत कुल 69,899 करोड़ रुपये की निवेश प्रतिबद्धताएं मिली हैं। 27,658 करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है।

प्रत्येक पार्क से लगभग 3 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे, जो सभी सात साइटों पर 21 लाख से अधिक औपचारिक आजीविका के अवसरों में बदलेंगे। यह ग्रामीण परिवारों और विशेषकर महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगा, जो परिधान निर्माण की रीढ़ हैं। बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का यह विशाल प्रयास, वस्त्र क्षेत्र के महत्वाकांक्षी 'विजन 2030' का मुख्य आधार है, जिसका लक्ष्य इस दशक के अंत तक भारतीय वस्त्र उद्योग को 350 अरब डॉलर की वैश्विक महाशक्ति बनाना है।

(लेखक केंद्रीय वस्त्र राज्य मंत्री हैं)