कांसे की कलई

नवभारतटाइम्स.कॉम
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अभी हाल ही में एक राज्य में एक बड़े नेता की स्मृति में उनकी कांस्य प्रतिमा लगी, इस पर 13 लाख रुपये का खर्च आया था। यह प्रतिमा एक साल पहले ही स्थापित हुई थी। लेकिन इस मॉनसून में हुई तेज बारिश ने खुलासा किया कि मूर्ति कांस्य की न होकर सीमेंट की बनी थी, उस पर केवल कांसे का रंग कर दिया गया था। तेज बारिश में रंग की परत निकल गई। अब जांच की मांग हो रही है।

इस घटना पर मेरा नजरिया उलट है। कहते हैं कि हर आविष्कार पहले घोटाला समझा जाता है। जिस तरह कभी लोगों ने प्लास्टिक के चावल, नकली दूध और सिंथेटिक पनीर को गंभीरता से नहीं लिया, उसी तरह सीमेंट की कांस्य प्रतिमा वाले मामले को भी लोग बेवजह विवाद बना रहे हैं। मेरी राय में हमें इस घटना को दूरदृष्टि से देखना चाहिए। आखिर कब तक हम कांसा, लोहा और स्टील जैसी पुरानी धातुओं से चिपके रहेंगे? दुनिया बदल रही है। जब दूध पाउडर का हो सकता है, घी वनस्पति का हो सकता है, तो कांसा सीमेंट का क्यों नहीं हो सकता? यह तो ' मेक इन इंडिया ' का अगला चरण है। हो सकता है आने वाले समय में सीमेंट की कारें बनें, सीमेंट के हवाई जहाज उड़ें और सीमेंट के मोबाइल फोन जेब में रखे जाएं।
वैसे भी जनता का प्रतिमा से रिश्ता केवल दर्शन तक रहता है। किसी ने आज तक मूर्ति पर हथौड़ा मारकर यह जांच नहीं की कि वह कांसे की है या सीमेंट की। जनता को जो दिखा, वही सच था। असली गलती तो पेंट कंपनी की है। अगर रंग थोड़ा और टिकाऊ होता तो आज भी पूरा शहर गर्व से उसे कांस्य प्रतिमा ही मान रहा होता। दूसरा दोष मॉनसून का है। इस साल तो उम्मीद बंधाई गई थी कि बारिश सामान्य से कम रहेगी। लेकिन बादलों ने बिना सूचना इतनी ईमानदारी से बरसकर पूरी योजना चौपट कर दी। मुझे लगता है कि अब सरकार को इस अनुभव से सीख लेनी चाहिए। भविष्य में जहां भी कांस्य रंग की सीमेंट प्रतिमाएं लगें, उनके साथ सीमेंट का छाता भी अनिवार्य किया जाए। इससे रंग भी सुरक्षित रहेगा और अगली बारिश तक जनता का विश्वास भी।