Tadka Not Just Taste But The Color Of Language And Life
तड़का लगा दो
नवभारतटाइम्स.कॉम•
भाषा तभी जीवंत बनती है, जब उसके शब्द जीवन के अनुभवों से जन्म लेते हैं। 'तड़का' ऐसा ही एक शब्द है, जिसमें ध्वनि, स्वाद, संस्कृति और लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति एक साथ होती है। यह शब्द हिंदी की 'तड़कना' क्रिया से बना है, जिसका अर्थ है- चटकना, फटना या अचानक तेज आवाज के साथ खुलना। जब गर्म तेल या घी में जीरा, राई, हींग, लाल मिर्च या करी पत्ता डाला जाता है, तो 'तड़-तड़' की आवाज आती है। माना जाता है कि इस ध्वनि से ही 'तड़का' शब्द की उत्पत्ति हुई। अवधी और छत्तीसगढ़ी में इसे छौंक, जबकि उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में बघार कहा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि 'तड़का' केवल रसोई तक सीमित नहीं। लोकभाषा में इसका अर्थ भोर या सुबह भी है। रात का अंधेरा छंटते ही लोग कहते हैं, ‘तड़का हो गया’ या ‘कल तड़के मिलेंगे।’ यही शब्द आज रूपक बनकर भी खूब प्रचलित है। लेख, भाषण, फिल्म या बातचीत को अधिक रोचक बनाने के लिए लोग मुस्कराकर कहते हैं, ‘इसमें थोड़ा तड़का लगा दो।’ झारखंड और बंगाल के कुछ इलाकों में आकाशीय बिजली को भी तड़का कहते हैं। शायद बिजली के कड़कने की आवाज से यह शब्द गढ़ा गया होगा।