समर्पण आनंद देने लगे तो वह सच्ची भक्ति बन जाता है

Contributed byश्री श्री आनंदमूर्ति|नवभारतटाइम्स.कॉम
surrender is true devotion when you feel joy understand it as union with god
सच्चा भक्त कौन? वह जो न केवल ईश्वर से, बल्कि संपूर्ण सृष्टि से प्रेम करता है। वह समाज, प्रकृति, जीव-जंतु और प्रत्येक वस्तु में उसी परम चेतना का दर्शन करता है। वह सीमित और अस्थायी संसार को भी उसी अनंत सत्ता का अंश मानता है। ऐसा भक्त सांसारिक सुखों से भागता नहीं, बल्कि उन्हें समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार प्रकट होने वाले आनंद के रूप में देखता है। वही सच्चा रसिक है, क्योंकि उसका मन ईश्वर की ओर भागता है। तैत्तिरीय उपनिषद का एक सूत्र है- रसो वै सः। यानी परमात्मा ही परम रस हैं। जो इस दिव्य रस का अनुभव कर लेता है, वही सच्चा आनंद प्राप्त करता है। स्वार्थ, अहंकार और वासना उस आनंद में विष घोल देते हैं। लेकिन, जब उसे प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का स्वरूप दिखाई देता है, तब वही संसार अमृतमय बन उठता है। मध्यकालीन कवि चंडीदास ने भी कहा है कि संसार में बहुत लोग स्वयं को रसिक कहते हैं, लेकिन वास्तविक रसिक बहुत दुर्लभ होते हैं।

दीपक की लौ जितनी उज्ज्वल होती है, उतनी ही प्रबल होती है उसकी अग्नि भी। उसकी चमक से आकर्षित होकर पतंगे उसके चारों ओर मंडराते हैं और अंत में उसी अग्नि में जलकर नष्ट हो जाते हैं। भक्ति का अंतिम चरण पूर्ण समर्पण है। भक्त अपने आराध्य को सब कुछ अर्पित कर देता है। समस्त संसार मन में ही स्थित है, इसलिए जब मन ही ईश्वर को समर्पित हो जाता है, तब सब कुछ खुद ब खुद समर्पित हो जाता है।
एक प्रार्थना में भक्त कहता है, ‘हे पुरुषोत्तम! यह समस्त ब्रह्मांड आपका घर है और महाशक्ति आपकी सहचरी। आपको किसी वस्तु का अभाव नहीं। फिर मैं आपको क्या अर्पित करूं? मैं अपना मन आपको समर्पित करता हूं। कृपया इसे स्वीकार कर मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाइए।’ यही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है, जहां प्रेम, समर्पण और आनंद एकाकार होकर मनुष्य को परमात्मा के निकट पहुंचा देते हैं।

(प्रस्तुति : दिव्यचेतनानंद अवधूत)