आसफ़उद्दौला की मेहरबानी से सेवक बना राजा

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अवध के चौथे नवाब आसफउद्दौला को आमतौर पर उनकी दरियादिली के लिए जाना जाता है। हालांकि इतिहासकार बताते हैं कि सूबे के नवाबों में वही सबसे विलासी थे, वाजिद अली शाह से भी ज्यादा और 'आसफ' तखल्लुस से शायरी भी किया करते थे। हुआ दरअसल यह कि 1784 में पड़े भीषण अकाल के वक्त अपनी प्रजा को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने जिस तरह खजाने का मुंह खोला, उससे कहावत चल निकली - जिसको न दे मौला, उसको दे आसफउद्दौला।

नृत्य में डूबे । ताज्जुब कि उनकी यह दरियादिली सबसे ज्यादा उनके खास खवास यानी सेवक भवानी महरा के हिस्से आई। पालकी ढोने वाले इस सेवक ने सेवाभाव, ईमानदारी व वफादारी से आसफउद्दौला को वश में कर रखा था। एक बार होली पर उसने कुछ नर्तकियों को खास तरह का प्रशिक्षण देकर अपनी जाति के लोकप्रिय कहरा नाच में पारंगत किया। फिर एक दिन जब आसफउद्दौला भंग की तरंग में डूबे थे, उन्हें उनका नाच दिखाया। उनको वह नाच रुचा तो उन्होंने सभी नर्तकियों के लिए उसे सीखना जरूरी कर दिया। फिर तो सूबे में लगभग सारे ही उत्सवों व त्योहारों पर कहरा की धूम मचने लगी।
कहारों की ईर्ष्या । एक दिन आसफउद्दौला अचानक भवानी से इतने खुश हो गए कि उसको राजा की उपाधि दे डाली। इतना ही नहीं, उपाधि की गरिमा के अनुरूप आवागमन के लिए राजसी ठाट-बाट वाली सुसज्जित पालकी भी दी। लेकिन, अभी भवानी ठीक से उनका शुक्रिया भी अदा नहीं कर पाया था कि कहार जाति उसके प्रति बुरी तरह ईर्ष्यालु हो उठी। उसने यह कहकर उसकी पालकी ढोने से इनकार कर दिया कि वह राजा होगा अपने घर का, हमारे निकट तो कहार ही है।

महल भी मिला । आसफउद्दौला को पता चला तो उन्होंने इन 'जले हुओं' को और जलाने की सोच ली। भवानी को अपने शीशमहल के पास ही महल जैसा मकान दिलाया, जिसमें वह राजसी ठाठ के साथ रहने लगा। पहले वह पीर खां की गढ़ी में बेहद साधारण ढंग से रहता था। आसफउद्दौला ने अपने निजी व शाही खजाने की चाभियां भी उसे सौंप दीं और उनका निगहबान बना दिया।

लखनऊ में मोहल्ला । इससे भवानी का जलवा इतना बढ़ गया कि उसका नाम राजा टिकैत राय व राजा झाऊलाल जैसे प्रसिद्ध नायबों में शुमार हो गया। तब वह ' राजा महरा ' कहलाने लगा। बाद में उसको सूबे के बैसवाड़ा इलाके का नाजिम भी नियुक्त कर दिया गया और उसके नाम से लखनऊ में भवानी गंज नाम का एक मोहल्ला भी बसा।