BJP के लिए बिहार का संदेश

नवभारतटाइम्स.कॉम
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बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम सिर्फ बिहार सरकार ही नहीं, केंद्र सरकार के लिए भी जागते रहो की घंटी है। यह महज एक विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव नहीं था। प्रशांत किशोर ने इसे सफलतापूर्वक सम्राट चौधरी सरकार पर एक जनमत संग्रह के रूप में पेश किया। यह BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा खाली की गई सीट थी। इसलिए इस पर उनकी और मुख्यमंत्री की साख कसौटी पर थी। राजधानी पटना का स्थानीय क्षेत्र होने के कारण सीएम के लिए इस पर निगाह रखना अपेक्षाकृत आसान था।

पलट गया परिणाम । इस रिजल्ट ने बिहार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी सोचने पर मजबूर किया है। इसने प्रशांत किशोर की डूबती नैया को भी फिलहाल बचा लिया। मात्र आठ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था। तब 238 सीटों पर उन्होंने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 236 की जमानत जब्त हो गई थी। उनकी जन सुराज पार्टी को 3.5% से भी कम वोट मिले थे। उन्हें उम्मीद थी कि अरविंद केजरीवाल की तरह वह भी एक बड़ा उलटफेर कर पाएंगे, लेकिन दिल्ली और बिहार में अंतर है।
पीके पर सवाल । प्रशांत किशोर की आलोचना करने वाले सवाल उठाते हैं कि वह जिन-जिन पार्टियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, उन सभी के लिए उन्होंने रणनीति क्यों बनाई? अगर पैसे कमाने के लिए वह ईमान से समझौता कर सकते हैं तो इसकी क्या गारंटी कि आगे नहीं करेंगे। वैसे पिछले आम चुनाव में यह प्रमाणित हो गया कि विभिन्न दलों को जिताने का जो श्रेय वह ले रहे थे, वह आधारहीन था। अगर उनकी रणनीति इतनी कारगर होती तो उनकी पार्टी का वैसा हश्र नहीं होता जैसा हुआ। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि जितने लोगों ने उनके साथ सेल्फी खिंची, उतने लोगों ने भी वोट नहीं दिया।

भ्रष्टाचार से परेशान । इस उपचुनाव में BJP की हार के अनेक कारण हैं। BJP समर्थकों का एक हद तक पार्टी से मोहभंग हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नियमावली में संशोधन से सवर्ण नाराज थे। भरत तिवारी के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने से ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग खफा भी बताया जाता है। Gen-Z के आंदोलन का भी असर पड़ा।

जनता की उदासीनता । इन कारणों से BJP के तमाम समर्थक भी उदासीन हो गए और मतदान करने नहीं गए। बांकीपुर में केवल 34% मतदान हुआ। राजनीतिशास्त्री सेमूर मार्टिन लिपसेट ने लिखा है कि मतदान का प्रतिशत यदि बहुत ऊंचा चला जाए तो यह समाज में तनाव को प्रतिबिंबित करता है, क्योंकि हर व्यक्ति को डर होता है कि अगर उसका विरोधी जीत गया तो उसका नुकसान कर देगा। इसके विपरीत मतदान का सामान्य प्रतिशत मजबूत लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन, इतना कम प्रतिशत तो जनता की उदासीनता को ही दिखाता है, जो ठीक नहीं है।

ऐतिहासिक उपचुनाव । कई बार उपचुनाव के परिणाम दिशा मोड़ने वाले होते हैं। 1974 में शरद यादव का जबलपुर से लोकसभा का उपचुनाव जीतना बाजी पलटने वाला साबित हुआ। उन्हें लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दादा धर्माधिकारी के सुझाव पर जनता उम्मीदवार बनाया था। इसी तरह 1978 में चिकमगलूर से इंदिरा गांधी का लोकसभा उपचुनाव जीतना ऐतिहासिक साबित हुआ।

कमजोर विपक्ष । इस सबके बावजूद BJP की सबसे बड़ी ताकत यह है कि विपक्ष की विश्वसनीयता नहीं है। आम लोगों का मानना है कि उसके पास एक खास सम्प्रदाय के तुष्टिकरण के अलावा और कोई ठोस योजना नहीं। जो BJP पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाते हैं और संख्या के आधार पर भेदभाव को अधम बताते हैं, वे खुद जाति के मामले में 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' की बात करते हैं।

दोबारा जीतें भरोसा । सरकार अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाए, तो लोगों का विश्वास फिर जीत सकती है। साथ ही इस छवि को बदलने की जरूरत है कि विरोध करने पर सरकारी एजेंसियां परेशान करती हैं। वैराइटीज ऑफ डेमोक्रेसी (वी-डेम) ने भारत को उदार लोकतंत्र की श्रेणी से हटाकर चुनावी अधिनायकवाद की श्रेणी में रखा है। हालांकि इस आकलन से सहमत होना कठिन है, मगर इस इमेज को सुधारने की जरूरत है। भारत में चुनाव निष्पक्ष होते हैं, भले ही विरोधी ईवीएम के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाएं। BJP ने खुद को 'पार्टी विद ए डिफरेंस' बताया था। लोगों ने उस पर भरोसा किया। पार्टी को जनता के इस भरोसे को बहाल करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)