जीवन से भागना नहीं, जागृत होना है आध्यात्मिकता

Contributed byमयंक मुरारी|नवभारतटाइम्स.कॉम
spirituality not running away from life but becoming aware
मनुष्य ने ईश्वर की खोज में आकाश की ओर देखा, पर्वतों की चोटियों पर चढ़ा, गुफाओं में मौन बैठा और मंदिरों की घंटियों में उसे सुनने का प्रयास किया। और शायद उसने मान लिया कि जिसे वह खोज रहा है, वह उससे दूर है। यह उसकी बड़ी भूल थी, क्योंकि दूरी मिट जाए तो खोज भी समाप्त हो जाती है और केवल अनुभव ही शेष रह जाता है।

ईश्वर कोई वस्तु नहीं, जिसे पाया जा सके। वह कोई स्थान भी नहीं, जहां पहुंचना हो। वह जीवन की वही चेतना है, जिसके कारण हम सांस लेते हैं, चलते हैं, प्रेम करते हैं और उसी चेतना में विकसित होते हैं। लेकिन, मनुष्य ने धर्म को जीवन से अलग कर दिया है। जीवन कोई दुर्घटना नहीं, यह चेतना की एक अनवरत यात्रा है। जो व्यक्ति केवल सुख चाहता है, वह जीवन का आधा ही भाग स्वीकार करता है। वह हमेशा सुखी होने की चाहत में ही जीता है। इसके मुकाबले जो व्यक्ति दुख को समझने का साहस रखता है, वही जीवन की गहराइयों में उतरता है। उसे सुख और दुख के बीच का असली अंतर भी समझ में आ जाता है।
बीज यदि मिट्टी के अंधकार से डर जाए, तो वह कभी वृक्ष नहीं बन सकता। इसलिए यह मत पूछो कि ईश्वर कहां है। पहले यह देखो कि जीवन कहां नहीं है। जहां जीवन है, वहां उसकी उपस्थिति है। एक शिशु की मुस्कान में, किसी मां की करुणा में, एक किसान के श्रम में, एक वैज्ञानिक की जिज्ञासा में, एक कलाकार की कल्पना में और एक साधक के मौन में वही एक चेतना अलग-अलग रूपों में प्रकट हो रही है। आध्यात्मिकता का अर्थ जीवन से भागना नहीं, जीवन के प्रति पूरी तरह जागृत होना है। यह संसार त्यागने का नहीं, उसे नए नेत्रों से देखने का है। जिस दिन यह दिखाई देने लगेगा कि प्रत्येक क्षण में वही एक चेतना कार्य कर रही है, उसी दिन संसार और ईश्वर के बीच का विभाजन समाप्त हो जाएगा।

तब मंदिर केवल पत्थरों की इमारत नहीं रहेगा, पूरा आकाश मंदिर बन जाएगा। प्रार्थना केवल शब्द नहीं रहेगी, तुम्हारा जीवन ही प्रार्थना बन जाएगा। और ईश्वर कोई विश्वास नहीं रहेगा, वह तुम्हारे प्रत्यक्ष अनुभव का सत्य बन जाएगा।