कनॉट प्लेस की भीड़ में चमकते दो चेहरे

नवभारतटाइम्स.कॉम
feeling of peace in connaught place crowd story of a nameless mother and a kind girl
कनॉट प्लेस की सुबह हमेशा भीड़-भाड़ से शुरू होती है, लेकिन सावन के महीने में शिव मंदिर के आसपास एक अलग-सी शांति छा जाती है। घंटियों की आवाज, भक्तों के जयकारे और चंदन की खुशबू के बीच एक चेहरा हमेशा याद आता है, वह पतली-दुबली वृद्ध मां। झक सफेद बाल, माथे पर हल्का चंदन और आंखें हमेशा बंद। सुबह 10 बजे तक वह चुपचाप शिवलिंग के पास अपना स्थान ले लेतीं और शाम छह बजे तक आंखें मूंदे प्रभु का नाम जपती रहतीं। कोई नमस्ते करता तो आशीर्वाद देकर फिर से उसी ध्यान में खो जातीं।

खाली हुई जगह । लगभग डेढ़ साल से मां जी नहीं आईं। कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आती थीं, कहां रहती थीं। सिर्फ इतना अंदाजा था कि इतनी उम्र में रोज दूर से आना संभव नहीं। आसपास ही उनका ठिकाना होगा। मंदिर में उनकी अनुपस्थिति खल जाती है। अब वहां अनजान लोगों को आर्शीवाद देने वाला कोई नहीं रहा। भक्त आते-जाते रहते, लेकिन वह खाली-सी जगह हमेशा खटकती है।
उसकी सबसे पहचान । उसी कनॉट प्लेस की सुबह में एक और चेहरा रोज दिखता है। जनपथ, जनपथ लेन और रीगल सिनेमा के आसपास। सुबह आठ से 10 बजे तक। एक हाथ में अखबार, माथे पर तिलक, सादी-सी लेकिन साफ-सुथरी पोशाक। रास्ते में काम करने वाले, फुटपाथ पर सोने वाले, यहां तक कि स्ट्रीट डॉग्स भी उसे पहचानते हैं। वह रुककर हालचाल पूछती है, कभी कुत्तों से भी कुछ बातें करती हुई लगती है। कभी बैंक ऑफ बड़ौदा बिल्डिंग के पीछे छोटे मंदिर से बाहर या आसपास खड़ी मिल जाती है। कभी किसी विदेशी पर्यटक को रास्ता बताती है।

शांति का अहसास । दोनों चेहरे अलग-अलग हैं। एक मंदिर के अंदर घंटों ध्यानमग्न, दूसरी सड़कों पर घूमती हुई दयालु। एक अब गायब है, दूसरी अब भी रोज दिखाई देती है। दोनों को देखकर एक ही भाव उठता है शांति का। मां जी के आशीर्वाद में शब्दों से परे गहराई थी। लड़की की मुस्कान और रुक कर पूछे गए सवालों में वह गर्मजोशी रहती है जो राजधानी की भागदौड़ में दुर्लभ हो गई है। कभी-कभी मन में सवाल उठता है, क्या मां जी फिर से मंदिर आएंगी? कोई नहीं जानता।

इंसानियत का स्पर्श । मंदिर नियमित आने वाले कहते हैं कि मां जी आसपास ही रहती होंगी। लड़की भी यहीं की बताई जाती है। दोनों की उम्र और व्यवहार बिलकुल अलग, फिर भी कनॉट प्लेस की धड़कन में दोनों शामिल हैं। एक ने मंदिर को अपना घर बना लिया था, दूसरी ने सड़कों को। एक चुपचाप आशीर्वाद बांटती थी, दूसरी हालचाल पूछती है। दोनों ही बिना कुछ मांगे कुछ दे जाती हैं- एक भक्ति का सुकून, दूसरी इंसानियत का स्पर्श।