Mangarh Sacrifice The Saga Of The Jallianwala Bagh Of Tribals
मानगढ़ का बलिदान
नवभारतटाइम्स.कॉम•
अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से भारत कराह रहा था। आजादी की अलख देशभर में जल चुकी थी और इस संघर्ष में आदिवासी समाज भी पीछे नहीं था। वर्ष 1913 में महान समाज सुधारक और आध्यात्मिक नेता गुरु गोविंद गिरी ने भगत आंदोलन के माध्यम से भील आदिवासियों को संगठित कर उनमें स्वाभिमान, सामाजिक सुधार और अपने अधिकारों के प्रति चेतना जगाई। वह बेगार, भारी लगान और स्थानीय रियासतों के शोषण के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठा रहे थे। इससे भयभीत अंग्रेजों ने 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्र हजारों लोगों को घेर लिया। ब्रिटिश सेना और कुछ स्थानीय रियासतों की संयुक्त टुकड़ियों ने निहत्थे आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इसमें लगभग 1,500 भील और अन्य आदिवासी शहीद हो गए। इतिहास में यह घटना ‘ आदिवासियों का जलियांवाला बाग ’ के नाम से स्मरण की जाती है। मानगढ़ का बलिदान स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज के अदम्य साहस और राष्ट्रप्रेम का अमर प्रतीक है। इन शहीदों का रक्त व्यर्थ नहीं गया। उनके बलिदान ने आजादी की लौ को और प्रज्ज्वलित किया। मानगढ़ आज भी हमें अन्याय के विरुद्ध एकता, साहस और स्वाभिमान का संदेश देता है।