Sawan A Sacred Opportunity To Connect With Nature And The Divine
सावन प्रकृति से परमात्मा तक जुड़ने का है अवसर
Contributed by: योगेंद्र माथुर|नवभारतटाइम्स.कॉम•
सनातन दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापकता है। वह किसी एक मत को अंतिम सत्य नहीं मानता। यहां ईश्वर के स्वरूप को लेकर द्वैत और अद्वैत, दोनों ही दर्शन स्वीकार किए गए हैं। किसी के लिए ईश्वर भक्त से अलग आराध्य हैं, तो किसी के लिए समस्त सृष्टि में व्याप्त चेतना। ज्ञान, कर्म, प्रेम और भक्ति - सभी मार्ग उसी परम सत्य तक पहुंचने के साधन माने गए हैं। ऋषि-मुनियों, संतों और धर्मदर्शियों ने एक बात पर विशेष बल दिया है कि ईश्वर किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं। वे मंदिर की प्रतिमा में भी हैं और प्रकृति के कण-कण में भी। वे निराकार भी हैं और साकार भी, आदि भी हैं और अनंत भी। शायद यही कारण है कि सावन का महीना ईश्वर की उपस्थिति को सहज अनुभव कराने वाला माना गया है। वर्षा की रिमझिम, हरियाली से आच्छादित धरती, झूमते वृक्ष और गूंजते शिवभजन मन को भीतर तक स्पर्श करते हैं। बाहर की वर्षा जैसे धरती को तृप्त करती है, वैसे ही भक्ति की वर्षा अंतर्मन को निर्मल बनाती है।
संतों ने कहा है, ‘भाव के भूखे हैं भगवान...।’ भगवान बाहरी आडंबर नहीं, हृदय की निष्कपटता स्वीकार करते हैं। रामचरितमानस में भगवान श्रीराम कहते हैं, ‘निश्छल मन जन सो मोहे पावा। मोहे कपट छल छिद्र न भावा।’ यानी निर्मल और निष्कपट मन वाला ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। मन को निर्मल बनाना आसान नहीं, क्योंकि वह इच्छाओं, वासनाओं और अहंकार से विचलित रहता है। इसलिए हमारे ऋषियों ने ध्यान, योग, जप और स्वाध्याय का मार्ग बताया। नियमित साधना से मन शांत होता है, विकार क्षीण होने लगते हैं और भीतर शांति का अनुभव होने लगता है।सावन हमें यही संदेश देता है कि जैसे वर्षा प्रकृति को हरित और जीवनदायी बनाती है, वैसे ही श्रद्धा, भक्ति और साधना से मन पवित्र होता है। जब बाहर बादल बरस रहे हों, तब भीतर भी प्रेम, करुणा और विश्वास की वर्षा होने दें। संभव है, उसी क्षण यह अनुभूति हो कि जिसकी खोज हम बाहर कर रहे थे, वह तो सदैव हमारे अपने अंतर्मन में ही विराजमान था।