पड़ोस में बम

नवभारतटाइम्स.कॉम
political turmoil in pakistan government accuses public protests of foreign conspiracy
'गजब देश है महराज! पब्लिक अपनी मांगें पूरी करवाने के लिए आंदोलन कर रही है, लेकिन सरकार कह रही है कि यह सब विदेशी साजिश है। विदेशी फंडिंग का आरोप लगा रही है।'

लंबे अरसे के बाद फिरकी मियां मिले तो दुआ सलाम के साथ ही चालू हो गए। मैं कुछ हालचाल पूछ पाता, उससे पहले ही उन्होंने नया टुकड़ा जोड़ा, 'यही नहीं, मीडिया भी सरकारी भोंपू बन गया है। जो इक्का दुक्का अखबार या टीवी चैनल हकीकत बताने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर सरकारी दबाव पड़ रहा है कि चुप रहो या जो हम कह रहे, वही दोहराओ।'
मैंने सोचा कि इनको रोकने का एक तरीका चाय हो सकती है, सो अपन उन्हें खींच ले गए एक टपरी की ओर, जो खुद को मॉडर्न दिखाने के चक्कर में मोमोज स्टॉल और चाय के ठीए के बीच कहीं फंसकर निहायत बेतुकी लग रही थी। लेकिन चाय का डिस्पोजेबल कप देखते ही उसके नाम सौ सौ बद्दुआएं रसीद करते हुए मियां फिर शुरू हो गए। 'पब्लिक कह रही है कि चुनाव सही से कराओ, तो सरकार लाठी गोली चला रही है। पब्लिक को ही बेईमान बता रही है। मीडिया का हाल ऐसा कि उसकी टेक यहीं रुकी हुई है कि पुलिस और सुरक्षा बलों के लोगों पर पब्लिक ही ज्यादती कर रही है। फौजियों की फटी वर्दी की तस्वीरें दिखा दिखाकर न जाने क्या साबित करना चाह रहे। इतनी भी नहीं समझते कि हर हथकंडे से लैस सरकार और पब्लिक को एक तराज़ू पर नहीं तौला जाता।'

अब पूछना लाजिम हो गया था कि बहुत दिनों बाद तैश में दिख रहे मियां कहां का रोजनामचा खोल बैठे हैं। मेरा सवाल सुनकर पहले तो उनने कप की तल्ली से चाय का आखिरी कतरा खींचा। फिर मेरी ओर ऐसे देखा, जैसे कोई परम बेवकूफ सामने आ गया हो। 'अपने पास पड़ोस का भी ध्यान रखा करो भाई। पाकिस्तान का हाल है ये। पड़ोस में इस बम को नजरअंदाज तो न करो।'