दशकों की कोशिशों के बाद महिलाएं धीरे-धीरे कार्यस्थलों पर अपनी जगह बना रही थीं। फिर भी उनकी राह आसान नहीं थी। कम श्रम भागीदारी, समान काम के लिए पुरुषों के मुकाबले कम वेतन, लीडरशिप के कम अवसर, घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारी जैसी चुनौतियां अब भी उनके साथ ही हैं। इसी बीच, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) ने दस्तक दे दी है। जिस AI को उत्पादकता और विकास का नया इंजन माना जा रहा है, वही महिलाओं के लिए नई असमानताओं का कारण भी बन सकता है।
रिसर्च में चिंता । अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रमुख गिल्बर्ट एफ. होंगबो ने भारत में अपने तीन-दिवसीय दौरे के बाद कहा, 'अगर हमने सतर्कता नहीं बरती, तो AI औरत और आदमी के बीच की खाई को और अधिक बढ़ा देगा।' क्या वाकई AI स्त्रियों की अब तक हासिल सामाजिक-आर्थिक प्रगति को धीमा या उल्टा सकता है? ILO, UNESCO और भारत के कुछ शोध भी चिंता जता रहे हैं कि अगर तैयारी समय रहते नहीं हुई, तो AI कार्यस्थलों पर मौजूद लैंगिक असमानताओं को और गहरा कर सकता है। यहां AI से मतलब मुख्य रूप से जेनरेटिव AI (ChatGPT जैसे LLM) और AI-आधारित ऑटोमेशन तकनीकों से है।भारत में असर । इन रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया भर में पाया गया है कि AI का सबसे अधिक असर उन क्षेत्रों पर पड़ रहा है, जहां महिलाओं की भागीदारी अधिक है। जाहिर है, भारत भी इस असर से अछूता नहीं। जिन नौकरियों से महिलाएं सबसे अधिक जुड़ती हैं, वे ही सबसे पहले ऑटोमेशन, चैटबॉट और AI टूल्स की चपेट में आनी शुरू हो चुकी हैं।
कम भागीदारी । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर धीरे-धीरे महिलाओं ने शिक्षा, बैंकिंग, IT, BPO, मीडिया, प्रशासन और आंत्रप्रेन्योरशिप जैसे क्षेत्रों में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई है। हालांकि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के 10 लाख से अधिक आबादी वाले 46 शहरों में किए गए पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) की हालिया रिपोर्ट भी कहती है कि भारत में महिला श्रम भागीदारी दूसरे देशों के मुकाबले बेहद कम (करीब 27%) है।
ऑटोमेशन बनेगी बड़ी चुनौती । टैलेंट स्ट्रैटिजी फर्म 'अवतार करियर क्रिएटर्स' की रिसर्च के अनुसार, AI वर्कफोर्स में औरतों की भागीदारी को बुरी तरह झकझोर सकता है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। पहली, ज्यादातर महिलाएं ऐसी नौकरियों में हैं जिन्हें आसानी से ऑटोमेट किया जा सकता है। दूसरी, करीब 80% महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं। आसानी से ऑटोमेट हो सकने वाली नौकरियां यानी डेटा एंट्री, कस्टमर सपोर्ट, बैक-ऑफिस प्रॉसेसिंग, प्रशासनिक कार्य वगैरह। BPO सेक्टर में बड़ी संख्या में भारतीय महिलाएं ऐसी भूमिकाओं में है, जिन्हें AI के माध्यम से आसानी से स्वचालित किया जा सकता है।
कई और चुनौतियां । महिलाओं की इंटरनेट तक पहुंच पुरुषों से बेहद कम है। रिपोर्ट बताती है कि भारत की महिलाएं अपने कई पड़ोसी देशों की महिलाओं और पुरुषों, दोनों की तुलना में AI के कारण नौकरी गंवाने के अधिक जोखिम में हैं। जब श्रम भागीदारी पहले से ही कम हो, तो तकनीकी बदलाव का झटका भी अपेक्षाकृत अधिक पड़ेगा। AI काम करने का तरीका बदल रहा है, लेकिन इसका लाभ समान रूप से नहीं बंट रहा। यदि पुरुष नई AI तकनीक तेजी से अपनाते हैं और महिलाएं प्रशिक्षण पाने और अवसरों से पीछे रह जाती हैं, तो नौकरी बचने पर भी वेतन, पदोन्नति और करियर में लैंगिक अंतर और बढ़ेगा। घर और नौकरी की डबल शिफ्ट करती महिलाओं के लिए चुनौती रोजगार बढ़ाने की नहीं, AI के दौर के लिए उन्हें सुरक्षित करने और सक्षम बनाने की भी है।
भविष्य की तैयारी । AI सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर संगठनों, नीति-निर्माताओं और इकाई के तौर पर व्यक्तियों को जरूरी बदलाव के लिए दबाव डाल रहा है। समय रहते महिलाओं को डिजिटल कौशल, AI-आधारित प्रशिक्षण, री-स्किलिंग और बदलते काम के अनुरूप नए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। नई तकनीकी भूमिकाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाने की तैयारी स्कूली स्तर से ही शुरू होनी चाहिए। यदि महिलाएं समय पर नई तकनीकी दक्षताएं नहीं सीखतीं, तो वे उभरती नौकरियों में पीछे रह जाएंगी। इसलिए, तैयारी ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।