Behavior With Mallikarjun Kharge In Haldwani Is Shameful Questions On Caste Prejudice
शर्मनाक!
नवभारतटाइम्स.कॉम•
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस समय एक अहम सवाल है, क्या SC/ST कोटा में क्रीमी लेयर होनी चाहिए। तीन दिन पहले केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर कर इसका विरोध किया था। केंद्र का कहना था कि इन समुदायों को ऐतिहासिक रूप से जिस भेदभाव का सामना करना पड़ा है, उसकी वजह बस आर्थिक पिछड़ापन नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को जिस व्यवहार का सामना करना पड़ा है, वह इसी बात को साबित करता है।
हल्द्वानी की घटना । खरगे का आरोप है कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में उनकी सभा के बाद रामलीला ग्राउंड के शुद्धिकरण के लिए हवन किया गया। उन्होंने BJP से जुड़े लोगों पर ऐसा करने का आरोप लगाया है, जबकि सरकार ने इससे इनकार किया। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने घटना की निंदा करते हुए कहा है कि जांच की जाएगी।संवैधानिक मूल्यों का अपमान । यह घटना जितनी शर्मनाक है, उतनी ही चिंताजनक भी। जिस संगठन पर आरोप है, उसके सदस्यों ने आयोजन स्थल के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को बताते हुए इसके राजनीतिक इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। हालांकि यह मामला राजनीतिक विचारों के टकराव से ज्यादा समाज में गहरे तक व्याप्त जातिगत पूर्वाग्रह का है। जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है, कि खरगे संवैधानिक पद पर बैठे हैं। उनके साथ ऐसा होना उस पद और संवैधानिक मूल्यों का भी अपमान है।
अधूरी लड़ाई । जब खरगे जैसी शख्सियत को इस व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है, तो सहज सवाल उठता है कि आम आदमी की स्थिति क्या होगी? जिसके पास पद, पहचान या अपनी बात रखने का मंच नहीं है, उसके साथ सामाजिक स्तर पर क्या होता होगा? मंदिर जाने से रोकने या शादी में घोड़ी चढ़ने पर मारपीट जैसी घटनाएं तो आज भी सामने आती रहती हैं। इनसे पता चलता है कि सामाजिक बराबरी की लड़ाई अब भी पूरी नहीं हुई।
असल बदलाव । इस मामले में सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया और जांच का भरोसा स्वागत योग्य है। दोषियों के खिलाफ जांच के बाद कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही जरूरत उस सोच को भी बदलने की है, जो इंसानों के बीच फर्क करती है। देश में छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ कड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आ सकता है, जब समाज बदलेगा। 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे देश के विकास में इस तरह की घटनाएं बाधक हैं। विभिन्न क्षेत्रों में भारत आज नए मकाम हासिल कर रहा है। अपने लिए नए लक्ष्य तय किए हैं उसने, लेकिन जातीयता की जकड़न से निकले बिना यह सब अधूरा है।