सावन और संयम

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the pretense of restraint in sawan do we truly fast
सुखनंदन नमक-पानी से गरारे कर रहे थे, तभी मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर चमका नाम देख घड़ी पर नजर गई, जो सुबह के 10 बजा रही थी। फोन उठा संक्षिप्त जवाब दिया, ‘रास्ते में हूं, 10 मिनट लगेगा।’ ‘आप तो कह रहे थे कि सावन भर झूठ नहीं बोलेंगे’, नेपथ्य से सुधर्मा की आवाज गूंजी। कोई और होता तो उसको चुप भी कराते, लेकिन यहां नरम आवाज में बोले, ‘यह झूठ नहीं, इंडियन स्टैंडर्ड टाइम का विस्तार है।’

सावन भारतीय कैलेंडर में महज एक माह नहीं, मानवीय चरित्र का वार्षिक ऑडिट है। इसमें मनुष्य के भीतर संत और वकील, दोनों अवतरित हो जाते हैं। संत संयम बताता है और भीतर का वकील उसके टूटने पर तार्किक अपवाद। मरीज को डॉक्टर परहेज बताता है, तो उसका सवाल होता है, ‘बाकी खाया जा सकता है न?’ सावन के परहेज में दूसरे पूछते हैं, ‘यही छोड़ा है या कुछ और भी।’ लेकिन सुधर्मा लकीर की फकीर, सवाल दाग दिया, ‘जो पूरा नहीं वह परहेज क्या, बस ढोंग है!’ सुखनंदन ने दो गिलास बनाना शेक पीने के बाद लौकी, कुट्टू का आटा, फल, साबूदाना का डिब्बा सजाकर बंद किया और फिर सवाल से रूबरू हुए, ‘प्रिये! संयम कोई संविदा नहीं है, जो शर्तें टूटते ही रद्द हो जाए। यह ऐसा अनुबंध है, जिसमें इच्छाएं यथावत रहती हैं, बस उनके लिए सामाजिक-धार्मिक अनुमति पत्र जारी कर दिया जाता है।’
‘संयम का पैमाना क्या है?’ ‘मैंने मिठाई छोड़ रखी है, लेकिन रसगुल्ला खाया, क्योंकि वह प्रसाद था। इनकार करना ईश्वर की अवहेलना होती। इसी तरह जयचंद का लिफाफा स्वीकार किया, क्योंकि नकारना देवी लक्ष्मी की उपेक्षा होती। आस्था और व्यवस्था के लिए वर्जनाएं तोड़ी जा सकती हैं।’ सुखनंदन ने जवाब दिया। ‘तो आपने छोड़ा क्या है?’ ‘यह घोषणा करना कि मैंने सब छोड़ रखा है।’ सुखनंदन ध्यानमग्न हो गए। स्क्रीन पर स्टेटस चमका, ‘श्रावण का 17वां दिन, कठोर तप जारी…।’