विचारों की आज़ादी

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karl marx and freedom of thought unwavering even under state pressure
कार्ल मार्क्स ने 1842 में जब जर्मनी के अखबार ' Rheinische Zeitung ' के मुख्य संपादक का पद संभाला, तब उसकी पाठक संख्या हजार से भी कम थी। उन्होंने जनहित के मुद्दों को प्रमुखता दी। कुछ ही महीनों में पाठक संख्या बढ़कर दोगुनी से अधिक हो गई। सत्ता की बेचैनी बढ़ी। आखिरकार सरकार ने अखबार को दबाने का फैसला कर लिया। दिलचस्प बात यह रही कि दमन की खबर फैलते ही पाठकों की संख्या तीन हजार पार कर गई। लेकिन, अखबार में पैसा लगाने वाले शेयरधारक चिंतित हो उठे। उन्होंने मार्क्स से सरकार के प्रति नरम रुख अपनाने का आग्रह किया। मार्क्स ने समझ लिया कि अब संपादकीय स्वतंत्रता और आर्थिक हित आमने-सामने हैं। उन्होंने 1843 में संपादक पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने सत्ता को लिखा कि अखबार पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय जनता की राजनीतिक चेतना के बढ़ने का प्रमाण है। इसके बाद मार्क्स ने जर्मनी छोड़ दिया, लेकिन उनके विचार स्विट्जरलैंड, बेल्जियम, फ्रांस और ब्रिटेन से प्रकाशित होते रहे। मार्क्स का जीवन सिखाता है- सत्ता बदले, स्थान बदले, लेकिन विचारों की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।