जल संकट से निपटने का देवास मॉडल

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dewas model a model for overcoming water crisis over 40 thousand ponds changed the regions fate
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र का देवास कभी पानी से समृद्ध माना जाता था। लबालब तालाब, छलकती तलैया और कुओं से शुरू होती गांवों की सुबह इसकी पहचान थे। आजादी से पहले ही इस क्षेत्र में नलकूप आ गए और धीरे-धीरे भूजल का दोहन लालच की हद तक बढ़ता गया। मोटरों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ जमीनें भी बिकने लगीं और पानी निजी संपत्ति हो गया।

बदहाल स्थिति । किसानों ने इस दौड़ में सबसे अधिक भूजल का दोहन किया। कुछ किसानों ने तो अपने खेतों में 150 तक नलकूप लगा दिए। खेती मॉनसून पर निर्भर रही। पशुओं के चारे के लिए भी सरकारी मदद की दरकार पड़ने लगी। सूखे का असर खेतों से निकलकर घरों तक पहुंचा।
बढ़ने लगीं समस्याएं । देवास में पानी की कमी से सफाई की समस्या बढ़ी और महिलाओं की परेशानियां भी। पानी भरने की जिम्मेदारी के कारण लड़कियों की पढ़ाई पर असर पड़ने लगा। कुछ गांवों में तो शादी के रिश्ते तक आने बंद हो गए। बीमारी, पलायन और सामाजिक समस्याएं बढ़ीं। खेत छूटे, सपने छोटे हुए और देवास बदहाल होता गया।

किसान-प्रशासन साथ । 2006 तक भूजल स्तर 700 फीट तक नीचे जा चुका था। कुछ इलाकों में गहरे भूजल की गुणवत्ता भी खेती के लिए समस्या बनने लगी। किसानों ने पहली बार संकट को मौसम की मार नहीं, बल्कि अपनी भूल मानना शुरू किया। यहीं से फिर प्रयास शुरू हुए। प्रशासन ने समाधान में किसानों को भागीदार बनाया। किसानों ने अपनी जमीन का करीब 5% हिस्सा तालाबों के लिए दिया। बारिश का पानी रोकने और भूजल 'रिचार्ज' करने का संकल्प लिया गया।

साझेदारी का मॉडल । जमीन, श्रम और जिम्मेदारी किसानों की थी, लेकिन प्रशासन ने इसके लिए तकनीक और बैंक से लोन दिलाने में मदद की। प्रशासन के सहयोग से तकनीकी विशेषज्ञ किसानों के साथ खेतों में काम करने आए। सालभर में करीब 10 हजार तालाब बना दिए गए। तब जाकर इलाके के खेतों में हरियाली आई और किसानों को दूसरी फसल के साथ नई आय का रास्ता मिला। गेहूं, तिलहन, चिया और मछली ने खेती को जीविका से आगे आय का आधार बनाया। सूखे के बाद किसानों के चेहरों पर फिर चमक लौटी और तालाबों पर प्रवासी पक्षियों की भी वापसी हुई।

मिसाल बना देवास । अब किसान पानी बचाने और भूजल बढ़ाने की दिशा में काम करते हैं। यह महज जल प्रबंधन नहीं है, इस प्रयास में देवास ने इंसान और प्रकृति के रिश्ते को नई दिशा दी है। 40 हजार से अधिक तालाबों की यह पहल दूसरे क्षेत्रों के लिए भी मिसाल बनी। रोमन कवि वर्जिल के महाकाव्य 'एनिड' की पंक्तियां याद आती हैं, ‘एक दिन आज का दुख केवल स्मृति रह जाएगा।’ संयोग से देवास में वह दिन जैसे आ गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)